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🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏
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*दादू पिंजर पिंड शरीर का, सुवटा सहज समाइ ।*
*रमता सेती रमि रहै, विमल विमल जस गाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ स्मरण का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*तुलसीदास जी*
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*तुलसी राम उपासकी,*
*राम चरित वर्णन कर्यो ॥*
*वाल्मीकि कियो संसकृत,*
*श्री फल सम जानो ।*
*भाषा दाख समान,*
*पात परिश्रम मत मानो ॥*
*नर नारिन सुख भयो,*
*प्रेम से गावै निशि दिन ।*
*पातक सब कट जात,*
*सुनत निर्मल तन मन जन ॥*
*भक्त जगत निस्तार नै,*
*नाम रूप वोहित१ धर्यो ।*
*तुलसी राम उपासकी,*
*राम चरित वर्णन कर्यो ॥१९६॥*
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तुलसीदासजी का जन्म श्री गंगा बाराह क्षेत्र(सोरौं) के प्रान्त यमुनाजी के दक्षिण बांदा जिले के "तारी" ग्राम में सरयूपारी ब्राह्मण आत्मारामजी के द्वारा उनकी धर्मपत्नी हुलसी के गर्भ से वि. संवत् १५८९ श्रावण शुक्ल सप्तमी के दिन हुआ था । जन्म समय में मत भेद हैं किन्तु अधिकतर यही माना जाता है । कुछ सज्जन राजापुर का जन्म लिखते हैं किन्तु राजापुर जन्म स्थान नहीं है । विरक्त होने के पश्चात् राजापुर में कुछ समय निवास करते हुये भजन किया था और वहां संकट मोचन हनुमान् जी की मूर्ति भी स्थापन की थी । जन्म स्थान के विषय में और भी मतभेद हैं । आपकी गुरु परंपरा इस प्रकार है - स्वामी रामानन्दजी के शिष्य अनन्तानन्दजी, अनन्तानन्दजी के शिष्य नरहरिदासजी और नरहरिदासजी के शिष्य तुलसीदासजी हुये हैं ।
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छप्पयार्थ - राम उपासक तुलसीदासजी ने रामचरित का वर्णन किया है ।
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महर्षि वाल्मीकिजी ने संस्कृत में रामचरित का वर्णन किया था, वह नारियल के समान था, जैसे नारियल का खोपरा नारियल के फोड़नादि परिश्रम से प्राप्त होता है, चबाने में परिश्रम पड़ता है, पचाने में भी परिश्रम पड़ता है । किन्तु तुलसीदासजी का रामचरित हिन्दी भाषा में होने से द्राक्षों के समान है । द्राक्षों के खाने, पचाने आदि में कोई भी परिश्रम नहीं माना जाता, वैसे ही तुलसीदासजी के द्वारा रचित रामचरित के अध्ययन में अति परिश्रम नहीं होता है ।
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रामचरित मानस से राम भक्त नर-नारियों को अति आनन्द होता है । प्रेम पूर्वक रात्रि दिन गाते रहते हैं । राम चरित के गायन से सब पाप नष्ट हो जाते हैं और सुनने से श्रद्धालु जनों के तन मन निर्मल हो जाते हैं ।
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भक्त तथा जगत के लोगों का उद्धार करने के लिये तुलसीदासजी ने भगवत् नाम और रूप का वर्णन रूप जहाज१ संसार-सागर पर रख दिया है । इसमें बैठकर अर्थात् भगवान् के नाम चिन्तन और रूप के ध्यान द्वारा वा अध्ययन द्वारा ज्ञान प्राप्त करके संसार-सागर से पार होते हैं ।
(क्रमशः)

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