रविवार, 24 अक्टूबर 2021

*२०. सारग्राही कौ अंग ~ २५/२८*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२०. सारग्राही कौ अंग ~ २५/२८*
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कहि* जगजीवन भैहरन४, सो कहिये भगवान ।
भजियत जैसैं आंन कृत, गो प्रिथमी गुर ग्यांन* ॥२५॥
(४. भैहरन=भयहर्ता)
(*=*. जैसे हम दूध, अन्न एवं ज्ञानोपदेश के कारन गौ, पृथ्वी एवं गुरु का सम्मान करते हैं; उसी प्रकार हमें भयहरण के कारण भगवान् का भी स्मरण करना चाहिये ॥२५॥)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो भय दूर करते हैं वे भगवान हैं अतः जिस प्रकार हम दूध के लिये गौमाता, अन्न के लिये धरती माता, व ज्ञान के लिये गुरु महाराज का सम्मान करते हैं वैसे ही हमें भय व चिंता मुक्त करनेवाले प्रभु का भी सम्मानपूर्वक स्मरण करना चाहिये ।
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काया कारण५ जे मिटै, तो हरि भैटैं आइ ।
कहि जगजीवन भगति करि, भगवंत गति६ लहै आइ ॥२६॥
(५. कारण=हेतु)   (६. गति=भगवान् की ओर जाने का मार्ग)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि यदि कोइ जीव किसी अन्य जीव के उपकार के लिये मिटे तो उसे उसके परोपकार के बदले परमात्मा मिलते हैं । जो प्रभु की भक्ति करते हैं, प्रभु उन्हें अपनी गति भी दे देते हैं वह मार्ग बता देते हैंजो उन तक जाता है ।
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नव व्याकरण निवास हरि, अक्शर अक्शर नांम ।
कहि जगजीवन ब्रह्म थिति१, रोम रोम धुनि रांम ॥२७॥
(१. ब्रह्मथिति=स्थितप्रज्ञता)
संतजगजीवन जी प्रभु की व्यापकता बताते हुये कह रहे है किसी भी व्याकरण के अक्षर अक्षर में प्रभु का नाम है । और जो स्थित प्रज्ञ है उनके रोम रोम से राम धुन निकलती रहती है ।
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कहि जगजीवन गोद ले२, पिता पढ़ावै पूत ।
सो सुध३ वाणी ऊचरै, संसकृत समझै सूत४ ॥२८॥
(२. गोद ले=पिता अपने पुत्र को अपनी गोद में बैठा कर)
{३. सुध=शुद्ध(निर्दोष)} (४. सूत=उचित विधिपूर्वक)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जैसे पिता अपने पुत्र को गोद में बिठाकर शिक्षा देते हैं वैसे ही प्रभु भी अपने जन को विधिपूर्वक शिक्षित कर निर्दोष करते हैं ।
(क्रमशः)

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