सोमवार, 25 अक्टूबर 2021

*अति उग्र तेज तप भयो तुलसीदास को*

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*दादू नीका नांव है, हरि हिरदै न बिसारि ।*
*मूरति मन मांहैं बसै, सांसैं सांस संभारि ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ स्मरण का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*मूल मनहर* -
*काशी मध्य कामजित तपोधन योग वित,*
*अति उग्र तेज तप भयो तुलसीदास को ।*
*मगन महंत गति वाणी को विचित्र अति,*
*राम राम राम सत्य व्रत श्वासों श्वास को ॥*
*जत सत सावधान अमृत कथा को पान,*
*हरि की कृपा से सो हजूरी भयो पास को ।*
*राघो कहै राम काम अर्प्यो तन मन धाम,*
*गह्यो मत ऐन एक अटल आकाश को ॥१९७॥*
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तुलसीदासजी ने काशी में रहकर काम को जीता था । और आप तप को ही धन समझते थे । अष्टांग योग के ज्ञाता थे । उक्त साधनों से उनका तपतेज अति उग्र हो गया था ।
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वे भगवद् भजन में निमग्न रहते थे । उनकी स्थिति महान् पुरुषों के समान थी । अति विचित्र वाणी कहा करते थे । राम राम राम रटना उनका श्वासों श्वास का सच्चा व्रत था । यतित्व में, सत्य भाषण में और सत्य ब्रह्म की उपासना में सदा सचेत रहते थे ।
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हरि कथा रूप अमृत पान करते ही रहते थे । उक्त प्रकार के अपने व्यवहार से हरि कृपा के पात्र होकर वे हरि चिन्तन द्वारा हरि के समीप रहने वाले सेवक हो गये थे ।
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उनने राम की प्राप्ति रूप कार्य में अपना तन, मन और धन धाम सब हरि के समर्पण कर दिया था । इस प्रकार उनने प्रत्यक्ष रूप में ही एक अद्वैत ब्रह्म रूप आकाश को प्राप्त करने का अडिग सिद्धांत ग्रहण किया था ।
(क्रमशः)

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