सोमवार, 25 अक्टूबर 2021

*२०. सारग्राही कौ अंग ~ २९/३२*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२०. सारग्राही कौ अंग ~ २९/३२*
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रांम नांम सब कै सिरै५, कोई जन जांनै जांन ।
कहि जगजीवन हरि भगत, हरि मंहि राखै प्रांन ॥२९॥
(५. सिरै=सब से ऊपर)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि राम का नाम सर्वोपरि है कोइ विरला ही यह बात जानता है । जो हरि भक्त हैं उनके तो प्राण भी प्रभु में बसते हैं ।
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रांम रांम कहि रांम कहि, रांम रांम प्रकास ।
रांम रांम निरमल भगति, सु कहि जगजीवनदास ॥३०॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि राम राम कहने से प्रकाश होता है ज्ञान का उजाला होता है । राम स्मरण ही सबसे सरल व निर्मल भक्ति है ।
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रांम रांम कहि रांम कहि, रांम रांम निर्दोष ।
कहि जगजीवन रांम रटि, प्रांणी पावै पोष६ ॥३१॥
(६. पोष=पालन पोषण)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि राम राम बारम्बार कहो राम का नाम निर्दोष करता है । राम स्मरण से जीव को पोषण मिलता है यह आत्मिक पोषण है ।
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नव निधि मैं हरि नांउं ले, अठ सिधि ये ही जांनि ।
कहि जगजीवन भूमि सब, रांम ह्रिदा मंहि आंनि ॥३२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि नवनिधि के रुप में अर्थात बड़े खजाने के रुप में प्रभु का नाम ले । और सकल मनोरथ दायक आठों सिद्धि भी यह ही है । संत कहते हैं कि पृथ्वी पर राम को ही ह्रदयस्थ करो ।
(क्रमशः)

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