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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.११८)*
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*११८. विरह विनती । उत्सव ताल*
*अरे मेरे सदा के संगाती रे*
*राम ! कारण तेरे ॥टेक॥*
*कंथा पहरूँ, भस्म लगाऊँ,*
*वैरागिनि ह्वै ढ़ूंढ़ूँ, रे राम ॥१॥*
*गिरिवर वासा, रहूँ, उदासा,*
*चढ़ि सिर मेरु पुकारूँ, रे राम ॥२॥*
*यहु तन जालूँ , यहु मन गालूँ,*
*करवत शीश चढ़ाऊँ, रे राम ॥३॥*
*शीश उतारूँ, तुम्ह पर वारूँ,*
*दादू बलि बलि जाऊँ, रे राम ॥४॥*
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भा० दी०- हे नाथ! त्वं मम सदा सहायकोऽसि । अतस्त्वां पृच्छामि यत् साक्षात्कारार्थं मया किमनुष्ठेयम् ! यदि त्वदाऽऽज्ञास्यात्तर्हि कन्थाकोपीनवासा भस्माङ्गो विरक्त:सन् त्वामहमन्विष्यामि यथा संहता गोप्यो वनानान्तरं गायन्त्यो विचिक्युरुन्मत्तवत् । यो हि अन्विष्यति स हि त्वामाकाश-वदन्तरं बहभूतेषु सन्तं प्राप्नोति । अहं सुमेरुपर्वतारूढो भूत्वा पुनःपुन: प्रार्थये यत्त्वदर्थं किं सर्वदैव पर्वतवासं विदधामि ? किमग्नौ शरीरं भस्मसात्करोमि ? हिमालयमारुह्य शरीरमिदं पातयामि ? असिना शिरच्छेदनं विधाय तव चरणारविन्दयोः समर्पयामि ? यतो बाह्याभ्यन्तरज्ञानविहीनजनास्ते पर्वतवासादि -कठिनतपोऽनुष्ठाय त्वां प्राप्नुवन्ति । हिमालयगमनेनाग्निदाहेनासिना शिरच्छेदेनात्र हठयोग: प्रदर्शितः । यदि तव ध्यानं न भवेत्तयग्निदाहादिसाधनेन त्वां प्स्यामीतिभावः । पुन: पुनश्चरणकमलयो मं नामं पृच्छामि ब्रूहि केन साधनेन त्वं प्रसन्नो भवसि तदेव साधनमवलम्बे ।
उक्तंहि विवेकचूडा.-
तटस्थिता बोधयन्ति गुरवः श्रुतयो यथा ।
प्रज्ञयैव तरेद् विद्वानीश्वरानुगृहीतया ॥
स्वानुभूत्या स्वयं ज्ञात्वा स्वमात्मानमखण्डितं
संसिद्ध ससुखं तिष्ठेन्निर्विकल्पात्मनाऽऽत्मनि ॥
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हे नाथ ! आप मेरे सदा ही साथ रहते हैं, अतः मेरे संगी हैं । मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि आपके साक्षत्कार के लिये मुझे क्या साधन अपनाना चाहिये ? क्या कौपीन पहन कर, शरीर में भस्म लगाकर, विरक्त होकर, आपको तलाश करूं जैसे गोपियाँ गाती हुई पागल की तरह एक वन से दूसरे वन में आपको तलाश करती रहीं । क्योंकि जो आपको खोजता है, वह आकाश की तरह बाहर-भीतर सब भूतों में रहने वाले आपको प्राप्त कर लेता है ।
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मैं सुमेरु पर्वत पर चढकर आप से बार-बार प्रार्थना करता हूं कि क्या आपके लिये पर्वत वास स्वीकार करूं ? क्योंकि आप कठिन पर्वत-वासादि तपस्या से भी प्राप्त हो जाते हैं । या अग्नि में शरीर को जला डालूं ? क्या तलवार से अपना शिरच्छेदन करके आपके चरणों में भेट कर दूं ।
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यहां पर पर्वत-वास शिरच्छेदन, अग्नि-दाह से हठ, योग प्रदर्शित कर रहे हैं । अर्थात् यदि आपकी दया न होगी तो मैं अग्नि में जल कर, बर्फ में गल कर, शिर के टुकड़े करके मर जाऊंगा । अतः दया करो । आपसे मैं बार-बार नमस्कार करके पूछता हूं कि मैं कौन सा साधन आपकी प्राप्ति के लिये अपनाऊं ?
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विवेकचूड़ामणि में-
निष्पक्ष गुरु और श्रुति द्वारा दिया हुआ ज्ञान भी परोक्ष ही रह जाता है जब तक ईश्वर की दया से बुद्धि उसको ग्रहण न करले । अतः ईश्वर की कृपा से ही ज्ञान प्राप्त होता है । अपने अनुभव से अखण्ड आत्मा को जान आकर सिद्ध हुआ पुरुष निर्विकल्प भाव से आनन्दपूर्वक सदा आत्मा में ही स्थित रहता है ।
(क्रमशः)

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