सोमवार, 25 अक्टूबर 2021

शब्दस्कन्ध ~ पद #.११९

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.११९)*
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*११९. विनती । गजताल
*अरे मेरा अमर उपावणहार,*
*रे खालिक ! आशिक तेरा ॥टेक॥*
*तुम सौं राता, तुम सौं माता,*
*तुम सौं लागा रंग, रे खालिक ॥१॥*
*तुम सौं खेला, तुम सौं मेला,*
*तुम सौं प्रेम स्नेह, रे खालिक ॥२॥*
*तुम सौं लेणा, तुम सौं देणा,*
*तुम्हीं सौं रत होइ, रे खालिक ॥३॥*
*खालिक मेरा, आशिक तेरा,*
*दादू अनत न जाइ, रे खालिक ॥४॥*
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भा०दी०-हे जगज्जन्मकारकप्रभो ! त्वं शाश्वत: परमेश्वरोऽसि । त्वया सह मम स्नेहोऽनादिरस्ति । प्रवृद्ध मोन्मत्तस्त्वामेव ध्यायामि । त्वया सह सानन्दक्रीडां करोमि । तव मम चैक्यत्वेन भेदोऽपि नास्ति । अतस्त्वया सह दृढस्नेहबन्धनमस्ति । अहं तुभ्यं सर्वस्वं समर्प्य त्वां लब्बुमिच्छामि । यतस्त्वय्येवानुरक्तोऽस्मि । हे जगदीश ! तव प्रियभक्तोऽस्मि । त्वमपि भक्तप्रियोऽसि । त्वां हि शरणं यामि । नान्यत्र मे शरणमस्ति । इति मे दृढीयान् निश्चयोऽस्ति । अतो हे परमेश्वर! मयि त्वं दयस्व ।
उक्तंहि श्रीमद्भागवते- चित्तं सुखेन भवतापहृतं गृहेषु यन्निर्विशत्युत करावपि गृहकृत्ये । पादौ पदं न चलतस्तव पादमूलाद् यामः कथं ब्रजमथो करवाम किं वा ॥
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हे जगत् को बनाने वाले प्रभो ! आप अमर हैं और मेरे को भी आपने ही पैदा किया है । अतः मेरा आपके साथ स्नेह हो रहा है । प्रेम के बढ जाने से मैं पागल की तरह उन्मत्त हो रहा हूं । आपके साथ आनन्द का खेल खेल रहा हूं । 
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आपके साथ ही मेरा मेल है, क्योंकि जीव ब्रह्म के एक होने से मैं अपना सर्वस्व अर्पण करके आपको प्राप्त करना चाहता हूं । हे जगदीश्वर ! मैं आपका प्रिय भक्त हूं । आप भी भक्तों से प्रेम करने वाले हो । मैं आपको छोड़ कर कहीं अन्यत्र नहीं जाऊंगा । यह मेरा दृढ निश्चय है । अतः दया करो । 
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श्रीमद्भागवत में –
गोपियाँ कहती हैं कि हे कृष्ण ! आपने हमारे चित्त को अनायास ही चुरा लिया, अतः घर में जाने की इच्छा नहीं है । इन दोनों हाथों से घर का काम भी नहीं होता और हमारे पैर तो आपके चरण-कमलों को त्याग कर एक पग भी चल नहीं सकते । अतः ब्रज में कैसे जावें और वहां जाकर भी क्या करें ? 
क्योंकि चित्त, बुद्धि, इन्द्रियाँ, हाथ, पैर तो आपके पास हैं । अर्थात् जहां परमानन्द की प्राप्ति हो रही है, उस साधन को छोड़ कर दूसरा साधन कौन ग्रहण करता है ? इसी भाव को प्रदर्शित करने के लिये श्री दादूजी महाराज ने भी कहा है कि मैं आपको छोड़ कर अन्यत्र नहीं जाऊंगा । अतः दया करो । 
(क्रमशः)

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