मंगलवार, 26 अक्टूबर 2021

*तुलसीदासजी की पद्य टीका*

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*दादू कर सांई की चाकरी, ये हरि नाम न छोड़ ।*
*जाना है उस देश को, प्रीति पिया सौं जोड़ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ चितावणी का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*तुलसीदासजी की पद्य टीका*
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*इन्दव -*
*प्रीति तिया हि गई उठ बूझत,*
*दौरि गये सु गई वहि ठौरा ।*
*लाज मरी कहि रीस भरी अब,*
*राम भजो नित मांस चचौरा१ ॥*
*ज्ञान भयो सुन सोच विचारत,*
*जात बनारस धामहु छोरा२ ।*
*राम भजै हरि पूजन धारत,*
*मारत है मन है यह चोरा ॥१७७॥*
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आपका जन्म संवत् १५८९ श्रावण शुक्ला सप्तमी को हुआ था । समय पर यज्ञोपवीत होने पर विद्या अध्ययन किया । फिर विवाह हुआ, पीछे द्विरागमन हुआ । आपका स्त्री से प्रेम था । एक समय पिता के घर से भ्राता आदि कोई लेने आया था । स्त्री यह समझ कर कि पति से पूछने पर ये जाने नहीं देंगे । इससे बिना पूछे ही पिता के घर चली गई ।
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आप घर पर आये तब पत्नी को घर पर नहीं देखकर पूछा जब ज्ञात हुआ कि वह पिता के घर गई है, तब आप भी स्त्री प्रेम में देह दशा को भूलकर दौड़े हुये जहां वह गई थी उसी स्थान को चले गये । इनको देखकर इनकी स्त्री अति लज्जित हुई और कुछ क्रोध में भरकर बोली - आप रामजी में ऐसी प्रीति नहीं करते जो सुख और सुयश देने वाली है । आपने नित्य ही मेरे मांसमय अधरों को चूंसा१ है । इससे आपको न तो तृप्ति मिली है और न मिलने वाली है, मेरे शरीर में मांस, रुधिर, हाड़, चाम को छोड़कर और क्या है ? अब तो आप रामजी का भजन करो ।
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कहा भी है –
“काम बाम की प्रीति जग, नित-नित होत पुरान ।
राम प्रीति नित ही नई वेद पुरान प्रमान ॥१॥
लाज न लागत आपको, दौरे आये साथ ।
धिक-धिक ऐसी प्रीति को, कहा कहूँ मैं नाथ ॥२॥
अस्थि चर्ममय देहमम, ता में ऐसी प्रीति ।
तैसी जो श्रीराम में, होत न तो भव भीति ॥३॥
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पत्नी के मुख से उक्त वचन सुनने से उनको ज्ञान हुआ कि वास्तव में यह यथार्थ ही कहती है । फिर उक्त वचनों का यथार्थ रूप से सोच विचार करने पर आपके हृदय में ज्ञान-वैराग्य रूप सूर्य उदय हो गया और प्रथम दशा रूप रात्रि नष्ट हो गई । उसी समय आप उस स्थान को छोड़१ कर चल दिये ।
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पत्नी ने पीछे पश्चात्ताप करते हुये ठहरने के लिये कुछ प्रार्थना की किन्तु आपने उसकी ओर देखा भी नहीं । बाराह क्षेत्र में आकर नरहरिदास जी से दीक्षा लेकर वहां ही गुरुजी से रामायण सुनने लगे । फिर गुरुजी से आज्ञा लेकर काशी आये ।
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वहां निवास करते हुये रामजी का भजन करने लगे और मानसी तथा बाह्य दोनों प्रकार की हरि की पूजा प्रतिदिन करने का नियम धारण कर लिया और यह निश्चय करके कि यह मन ही विषयों में जा कर भजन पूजा आदि का समय चुराने से चोर है । अतः मनको अभ्यास और वैराग्य द्वारा मारने का अभ्यास करने लगे ।
(क्रमशः)

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