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*हम भूलैं, तूँ आन मिलावै, हम बिछुरैं, तूँ अंग लगावै ॥*
*तुम्ह भावै सो हम पै नाँहीं, दादू दर्शन देहु गुसांईं ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. २६५)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*बाहर जात रहै कुछ नीर हि,*
*भूत पिवे हनुमान बताये ।*
*आवत मन्दिर राम चरित्र,*
*सुनैं उठ जात सु पैल१ पिछाये ॥*
*जात लखे चलि आरण्य हू लगि,*
*पाँय परे दुरि दूरि सुनाये ।*
*जान न देत करी सु कृपा अब,*
*जानत कैसे सु भूत बताये ॥१७८॥*
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काशी में आप असी नदी के पार शौच जाया करते थे । कोई २ कहते हैं कि गंगा पार ही शौच जाते थे । शौच जाने के पश्चात् बचा हुमा जल स्वाभाविक नित्य एक कंटकी बेर के वृक्ष में डाल देते थे । वहां अन्यत्र का एक प्रेत आकर रहता था और वह पानी पीता था । प्रेत का अशुद्ध जल पीने का ही अधिकार होता है । एक दिन वह अति प्रकट होकर सुख पूर्वक बोला - "आपने मुझ प्रेत को पानी देकर प्रसन्न किया है, अत: कुछ माँगिये ।" आपने कहा - मुझे रामचन्द्रजी का दर्शन करा दो । उसने कहा - "यह शक्ति तो मुझ में नहीं है किन्तु उपाय बतलाता हूँ । अमुक मंदिर में नित्य रामायण की कथा होती है । उसे सुनने के लिये हनुमानजी गुप्तरूप से नित्य आते हैं । वे अति दीन मलीन रूप धारण किये रहते हैं । सबसे प्रथम आते हैं और सबसे पीछे जाते हैं । वे आपको रामचन्द्रजी का दर्शन कर देंगे ।"
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"रामकथा जहँ कोउ कहै, तहँ-तहँ पवन कुमार,
शिर कर अँजलि धरि सुनत, बहत नयन जलधार ।"
तुलसीदासजी उस कथा में जाने लगे और एक दिन उक्त लक्षणों के द्वारा हनुमानजी को पहचान गये ।.
जब हनुमानजी को जाते देखा, तब तुलसीदासजी भी उनके पीछे पीछे चले । वन में आ गये तब तुलसीदासजी ने दौड़कर उनके चरण पकड़ लिये तथा चरणों में पड़ गये । हनुमान् जी ने कहा - "दूर हटो दूर हटो तुम साधु होकर मुझे क्यों छूते हो ?"
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तुलसीदासजी बोले - मैं आपको पहचान गया हूँ, जाने नहीं दूंगा । अब आप मुझ पर सम्यक् प्रकार कृपा कीजिये । हनुमान् जी अपने रूप में प्रकट होकर बोले - तुमने मुझे कैसे पहचाना ? तुलसीदासजी ने कहा - एक भूत ने आपको पहचानने का उपाय बताया था, उसी से पहचाना है ।
(क्रमशः)

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