मंगलवार, 26 अक्टूबर 2021

शब्दस्कन्ध ~ पद #.१२०

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.१२०)*
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*१२०. स्तुति । गजताल
*अरे मेरे समर्थ साहिब रे अल्लह !*
*नूर तुम्हारा ॥टेक॥*
*सब दिशि देवै, सब दिश लेवै,*
*सब दिशि वार न पार, रे अल्लह ॥१॥*
*सब दिशि कर्त्ता, सब दिशि हर्ता,*
*सब दिशि तारणहार, रे अल्लह ॥२॥*
*सब दिशि वक्ता, सब दिशि श्रोता,*
*सब दिशि देखणहार, रे अल्लह ॥३॥*
*तूँ है तैसा, कहिये ऐसा,*
*दादू आनन्द होइ, रे अल्लह ॥४॥*
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भा० दी०-हे सर्वसमर्थस्वामिन् ! तव स्वरूपमेव मे जीवनाधारभूतम् । सर्वासु दिक्षु सर्वानन्नजलादिना पोषयति । भक्तदत्तमादिकं सर्वत्र त्वमेव गृह्णासि । सर्वत्र परिपूर्णोऽसि । नहि तवादिमध्यान्तसीमाऽस्ति । तद्वारैव सर्वेषु लोकेषु सर्वकार्याणि संपद्यन्ते । सर्वेन्द्रियाणां प्रेरकत्वात् ।- त्वमेव प्राणान् संहरसि । त्वमेव सर्वजनान् रक्षसि । त्वमेव भक्तान् संसारात्तारयसि । त्वमेव साक्षिरूपेण सर्वान् पश्यसि । सर्वेषु स्थलेषु त्वमेवोपदिशसि । भक्तप्रार्थनां श्रृणोसि । यतो यादृशं तवस्वरूपं तादृशं मह्यं दर्शय । त्वद्विषयकज्ञानेनैव त्वां विज्ञातुं शक्नुयाम् । भावत्कज्ञानेनैव जीवस्यानन्दो भवति नान्यथा ।
उक्तं श्वेताश्व-
विश्वतश्चक्षुरूत विश्वतो मुखो विश्वतो बाहुरूत विश्वत: स्यात् । संबाहुभ्यां धमति सं पतत्रैावाभूमी जनयन्देवः एकः ।
सर्वाननो शिरोप्रीवः सर्वभूतगुहाशयः ।
सर्वव्यापी भगवांस्तस्मात्सर्वगतः शिवः ॥
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हे सर्वसमर्थ स्वामिन् ! आपका स्वरूप ही मेरा आधार है, सर्व दिशाओं में सब को अन्न-जल दान करके सब का पोषण करते हैं । भक्तों के दिये हुए अर्ध्य अन्नजल को सर्व दिशाओं में आप ही ग्रहण करते हैं । आप सर्वत्र परिपूर्ण हैं । आपके आदि, अन्त न होने से आप अनन्त हैं ।
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आपके द्वारा ही सब दिशाओं में सब कुछ कार्य हो रहा है । दुष्टों का संहार, सज्जनों की रक्षा, आप ही करते हैं । सब दिशाओं में भक्तों को आप ही उपदेश देते हैं । अतः जैसा आपका रूप है, वैसा ही मुझे दिखाइये, जिससे मैं आपको जान जाऊं । आपके ज्ञान से ही जीव को परमानन्द की प्राप्ति होती है अन्यथा नहीं ।
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श्वेताश्व उप.- ३/३
सब जगह आंख वाला तथा सब जगह मुख वाला, सब जगह हाथ वाला और सब जगह पैर वाला, आकाश और पृथिवी की सृष्टि को बनाने वाला, वह एक मात्र परमात्मा मनुष्य आदि जीवों को दो-दो बाहुओं से युक्त करता है तथा पक्षी, पतंग आदि को पांखों से युक्त करता है ।
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वह भगवान् सर्व ओर मुख, शिर, ग्रीवा वाला है । सब प्राणियों के हृदय रूप गुहा में निवास करता है और सर्वव्यापी है । अतः वह कल्याण स्वरूप परमात्मा सब जगह में पहुँचा हुआ है ।
(क्रमशः)

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