शनिवार, 9 अक्टूबर 2021

*अग्रदासजी*

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🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏
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*जिहिं घट दीपक राम का, तिहिं घट तिमिर न होइ ।*
*उस उजियारे ज्योति के, सब जग देखै सोइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*अग्रदासजी*
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*मूल छप्पय -*
*अग्रदास आगर भयो,*
*हरि सुमरन पन प्रेम को ॥*
*बहुत बाग से प्रीति, रीति हरि की जिन जाणी ।*
*नीँदै१ गौंदै आप, आप परवाहै पाणी ॥*
*जो उपजै फल फूल, सोइ प्रभु जी को अरपै ।*
*साधु-लक्षण सा-पुरुष, भक्त भगवत से डरपै ॥*
*रात दिवस राघव कहै, उद्यम करत नित नेम को ।*
*अग्रदास आगर भयो,*
*हरि सुमरन पन प्रेम को ॥१८३॥*
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अग्रदासजी हरि स्मरण करने में दृढ़ प्रतिज्ञ थे अर्थात् निरंतर हरि स्मरण करते थे और हरि प्रेम की तो मानो खानि ही थे ।
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प्रभु की सेवा के लिये लगाये हुए बाग से आपका बहुत प्रेम था । इन्होंने बाग द्वारा हरि सेवा करने की रीति भली प्रकार जान ली थी ।
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स्वयं ही घास-उखाड़ते१ थे और खोदकर भूमि को पोली करते थे तथा आप ही पानी पिलाते थे ।
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उस बगीचे में जो भी फल फूल उत्पन्न होते थे सो सभी भगवान् के समर्पण करते थे । आप में संतों के लक्षण थे, आप श्रेष्ठ पुरुष थे । भक्तों से और भगवान् से डरते थे ।
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भगवान् की सेवा-पूजा, सन्त सेवा और बाग की सेवा से आदि अपने रात दिन के कार्यक्रम में नियमपूर्वक पूर्ण उद्योग करते थे, आलस्य कभी भी नहीं करते थे ।
(क्रमशः)

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