शनिवार, 30 अक्टूबर 2021

*आय कहा हनुमन्त लखे प्रभु*

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🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏
🌷🙏🇮🇳 *#भक्तमाल* 🇮🇳🙏🌷
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*गुरु पहली मन सौं कहै, पीछे नैन की सैन ।*
*दादू सिष समझै नहीं, कहि समझावै बैन ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. २६५)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*लेहु कछू वर राम मिलाव हु,*
*कामतनाथ१ मिलै प्रभु प्यारे ।*
*कौल कर्यो नवमी सुदि चैत्र हु,*
*प्रीति लगि वह द्यौस निहारे ॥*
*आवत वा दिन राम लखम्मन,*
*बाजि चढ़े पट रंग हर्यारे ।*
*आय कहा हनुमन्त लखे प्रभु,*
*मैं न पिछानत फेरि दिखारे ॥१७९॥*
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हनुमान् जी ने कहा - कुछ वर मांगलो । आपने कहा - रामचन्द्रजी के दर्शन करा दीजिये । हनुमान् जी ने कहा - चित्रकूट चलो, वहां ही प्रिय प्रभु के दर्शन होंगे ।
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हनुमान् जी ने चैत्र शुक्ल नवमी को रामचन्द्रजी का दर्शन कराने का प्रण किया था । उस दिन दर्शन करने के लिये आपके मन में अत्यधिक प्रीति लगी हुई थी । दर्शन की उत्कंठा में भरे हुये इनको हनुमान् जी ने बताया था, वहां ही कामदगिरि१ की परिक्रमा में जाकर बैठ गये और मन में विचार कर रहे थे कि शोभाधाम राम जी को कब देख सकूँगा ।
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इतने में ही उसी दिन रामजी और लक्ष्मण जी घोड़ों पर चढ़े हुये तथा हरे वस्त्र पहने हुये तुलसीदासजी के सामने से निकल गये । तुलसीदासजी ने नेत्र भर के देखा तो सही किन्तु उनको यह निश्चय नहीं था कि ये राम लक्ष्मण हैं ।
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पीछे से हनुमान् जी आकर बोले - तुमने भगवान् राम और लक्ष्मणजी का दर्शन किया । अभी जो घोड़ों पर चढ़े हुये तुम्हारे सामने से निकल कर आगे गये हैं वे राम लक्ष्मण ही थे । आपने कहा - ये रामजी और लक्ष्मणजी हैं, इस प्रकार पहचान कर तो दर्शन नहीं किया । तब हनुमान् जी ने कहा - अच्छा, सब अच्छी प्रकार करायेंगे । फिर एक दिन मन्दाकिनी के तट पर श्री सीतारामजी सिंहासन पर विराजमान हैं । भरतजी छत्र लिये हुये हैं । लक्ष्मण जी और शत्रुघ्नजी दाहिने बायें चँवर कर रहे हैं । इस प्रकार का दर्शन कृपालु हनुमान् जी ने तुलसीदासजी को कराकर कृतकृत्य कर दिया । फिर तुलसीदास जी काशी चले आये और चित्रकूट में दर्शन किया था उसी रूप का सदा ध्यान करते रहे ।
(क्रमशः)

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