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*साचा सतगुरु जे मिलै, सब साज संवारै ।*
*दादू नाव चढ़ाय कर, ले पार उतारै ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*पयहारी कृष्णदासजी के शिष्य*
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*छप्पय -*
*पयहारी गुरु धारि उर,*
*शिष्य इते भये पार सब ॥*
*अग्र कील्ह अरु चरण,*
*नरायण पद्मनाभ वर ।*
*केवल पुनि गोपाल, सूरज पुरुषा पृथु त्रिपुर ॥*
*टीला हेम कल्याण, देवा गंगा सम गंगा ।*
*विष्णुदास चांदन, सबीरां कान्हर पुनि रंगा ॥*
*जन राघव भगवंत भज,*
*शिर तें डार्यो भार अब ।*
*पयहारी गुरु धारि उर,*
*शिष्य इते भये पार सब ॥१८०॥*
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पयहारी कृष्णदास जी को हृदय में गुरु धारण करके इतने शिष्य हुये हैं और सभी संसार-सागर से पार भी हुये हैं । १. अग्रदासजी, २. कील्हदेवजी, ३. चरणदास जी, ४. व्रत हठीदासजी, ५. नारायणदासजी, ६. श्रेष्ठ पद्मनाभजी
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७. केवलदासजी, ८. गोपालदासजी, ९. सूर्यदासजी, १०. पुरुषा(पुरुषोत्तमदासजी), ११. पृथुदासजी, १२. त्रिपुरदासजी
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१३. टीलाजी, १४. हेमदासजी, १५. कल्याणदासजी, १६. देवापांडाजी, १७. गंगाजी के समान गंगादासजी अथवा गंगाबाई जी
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१८. विष्णुदासजी, १९ चांदनजी, २०. सबीरांजी, २१. कान्हरदासजी, २२. रंगारामजी ।
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नाभाजी ने दो और लिखे हैं २३. टेकरामजी, २४. गदाधारी(गदाधरदासजी) एक संत ने २५ वाँ गोविन्द दासजी भी लिखा है ।
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इन सब ने भगवान् का भजन करके अपने शिर से अहम् मम रूप भार अब अर्थात् इसी वर्तमान जन्म में उतार कर मुक्ति को प्राप्त हुये हैं ।
(क्रमशः)

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