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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१९. मधि कौ अंग ~ १/४*
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रांम रांम निरपक्ष सुमरि, मधि१ घर अलख अगाध ।
कहि जगजीवन उभै२ तजि, सहजि मिलैं सब साध ॥१॥
{१. मधि=मध्य(निष्पक्ष भाव)} (२. उभै=गृहस्थ तथा संन्यास; अथवा हिन्दू एंव मुसलमान)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि राम स्मरण निष्पक्ष करें । द्वैत व् अद्वैत के मध्य ब्रह्म का निवास है दोनों को छोड़कर सहज भाव ले सब साधु उन प्रभु से मिलते हैं ।
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नाभी हियड़ा बीच३ हरि, रांम रांम कहि रांम ।
कहि जगजीवन जुगल तजि, निरखि नूर निज ठांम ॥२॥
(३. नाभी हियड़ा के बीच=नाभि एंव ह्रदय के मध्य स्थान में)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि नाभि व ह्रदय के मध्य के स्थान में ही हरि है । अतः राम राम का स्मरण कर, संत कहते हैं कि इन दोनों(द्वैत व् अद्वैत) को त्याग कर जहाँ प्रभु है वह देख ।
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अरध४ उरध५ के मद्धि है, हाट पटण बाजार ।
जगजीवन तहां बिणजिये, निरमौलिक६ निज सार ॥३॥
{४. अरध=अधः(नाभि स्थान)} {५. उरध=ऊर्ध्व(ललाट प्रदेश)} {६. निरमौलिक=अमूल्य(किसी मूल्य के बिना)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि नाभि स्थान से लेकर मस्तक तक सारा दैविक व भौतिक व्यापार है । साधकों को वहीं अपना अमूल्य व्यापार करना चाहिये ।
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हिंदू हरि गुन ऊचरै, मुसलमान मिनि महर७ ।
कहि जगजीवन दरदवंद८, रांम अखंडित लहर९ ॥४॥
(७. महर=अहेतुकी कृपा) {८. दरदवंद=दर्दमन्द(=विरहयुक्त)}
(९. लहर=भक्ति की तरंग)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हिंदू तो साकार के गुणानुवाद करते हैं मुसलमान निराकार की कृपा बताते हैं । जिसे सच में परमात्मा से मिलने का विरह पीड़ा है वह राम भक्ति की तरंगों में ही खोया रहता है ।
(क्रमशः)

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