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*दादू बंझ बियाई आत्मा, उपज्या आनन्द भाव ।*
*सहज शील संतोष सत, प्रेम मगन मन राव ॥*
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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*उपजणि का अंग १६६*
इस अंग में अनुभव उत्पन्न होने संबंधी विचार कर रहे हैं ~
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रज्जब अज्जब१ ऊपजी२, सबको करै बखाण ।
ब्रह्म भजै माया तजै, सो प्राणी सु प्रमाण ॥१॥
उसको अदभुत१ अनुभव२ ज्ञान हुआ है, ऐसा सभी कथन कहते हैं । किंतु जो प्राणी माया को त्याग कर ब्रह्म का भजन करता है वही सु प्रमाणित अनुभवी होता है ।
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भाव१ भक्ति की ऊपजी, भली कहैं सब कोय ।
जन रज्जब जगपति खुशी, जन्म सफल यूं होय ॥२॥
जिसके हृदय में प्रेम१-भक्ति संबंधी अनुभूति हो जाती है, उसे सब ही भली कहते हैं और विश्वपति प्रभु भी प्रसन्न होते हैं । इस प्रकार मानव सफल बन जाता है ।
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उपजी१ आतम राम की, सो छानी क्यों होय ।
रज्जब दीसै सकल शिर, प्राणी प्रकट सु जोय२ ॥३॥
आत्म स्वरूप राम के संबंधी अनुभूति१ होती है, वह छिपी हुई कैसे रह सकती ? देख२, वह अनुभव युक्त प्राणी लोक में प्रकट होकर सबका शिरोमणि भासता है ।
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रज्जब उपजी१ आप सौं, सब तैं न्यारा२ होय ।
अंतरि३ परिचय४ एक सौं, क्या समझावै कोय ॥४॥
साधन द्वारा जिसके हृदय में अपने आप स्वरुपानुभूति१ हुई है, वह विचार द्वारा सबसे अलग२ होकर भीतर३ एक अद्वैत ब्रह्म का ही साक्षात्कार४ करता है । उसे कोई क्या ज्ञान समझायेगा ? वह तो समझा हुआ ही है ।
(क्रमशः)

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