रविवार, 31 अक्टूबर 2021

*(१)हाजरा महाशय । मुक्ति तथा षडैश्वर्य*

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*तन मन आत्म एक है, दूजा सब उनहार ।*
*दादू मूल पाया नहीं, दुविधा भ्रम विकार ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पारिख का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*परिच्छेद ९६ ~ अहेतुकी भक्ति*
*(१)हाजरा महाशय । मुक्ति तथा षडैश्वर्य*
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श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर-मन्दिर में भक्तों के साथ दोपहर का भोजन समाप्त करके अपने कमरे में बैठे हुए हैं । पास में जमीन पर मास्टर, हाजरा, बड़े काली, बाबूराम, रामलाल, मुखर्जियों के हरि आदि उपस्थित हैं, कुछ बैठे हैं और कुछ खड़े हैं । श्रीयुत केशव की माता के निमन्त्रण में कल उनके कोलूटोलावाले मकान में जाकर श्रीरामकृष्ण को खूब कीर्तनानन्द मिला था ।
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श्रीरामकृष्ण - (हाजरा से) - कल मैंने केशव सेन के यहाँ (नवीन सेन के घर पर) खूब आनन्द से प्रसाद पाया । बड़ी भक्ति से उन लोगों ने परोसा था ।
हाजरा महाशय बहुत दिन से श्रीरामकृष्ण के पास रहते हैं । 'मैं ज्ञानी हूँ' यह कहकर वे कुछ अभिमान भी करते हैं । लोगों से श्रीरामकृष्ण की कुछ निन्दा भी करते हैं । इधर बरामदे में तल्लीन होकर माला भी जपते हैं ।
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चैतन्यदेव को 'आधुनिक अवतार है' कहकर साधारण समझते हैं । कहते हैं 'ईश्वर केवल भक्ति देते हैं, यही नहीं, उनके ऐश्वर्य का भी ओर-छोर नहीं है; वे ऐश्वर्य भी देते हैं । उन्हें पाने पर अष्टसिद्धियों से शक्ति भी प्राप्त होती है ।' घर के लिए कुछ ऋण उन्हें देना है - हजार रुपये के लगभग होगा । इसके लिए उन्हें चिन्ता रहती है ।
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बड़े काली ऑफिस में काम करते हैं । तनख्वाह बहुत कम पाते हैं । घर में स्त्री और लड़के-बच्चे भी हैं । श्रीरामकृष्ण पर इनकी बड़ी भक्ति है । कभी-कभी ऑफिस जाना बन्द करके भी श्रीरामकृष्ण के दर्शन के लिए आते हैं ।
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बड़े काली - (हाजरा से) - तुम स्वयं अपने को तो पारस पत्थर समझते हो और दूसरों में कौनसा सोना खरा है और कौनसा बुरा, इसकी परीक्षा लेते फिरते हो - भला इस तरह दूसरों की इतनी निन्दा क्यों करते हो ?
हाजरा - जो कुछ कहना होता है, मैं इन्हीं के पास कहता ।
श्रीरामकृष्ण - और क्या !
हाजरा तत्त्वज्ञान की व्याख्या कर रहे हैं ।
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हाजरा - तत्त्वज्ञान का अर्थ है चौबीस तत्त्वों का ज्ञान प्राप्त करना; चौबीस तत्त्व कौन कौन से हैं । यह प्रश्न होता है ।
“पंचभूत, छः रिपु, पाँच ज्ञानेन्द्रिय और पाँच कर्मेन्द्रिय - यही सब ।"
मास्टर - (श्रीरामकृष्ण से हँसकर) - ये बतलाते हैं, छ: रिपु चौबीस तत्त्वों के भीतर हैं !
श्रीरामकृष्ण - (हँसकर) - अब इसी से समझो । और देखो, तत्त्वज्ञान का कैसा अर्थ बतलाता है ।
तत्त्वज्ञान का अर्थ है आत्मज्ञान । तत् अर्थात् परमात्मा, त्वं अर्थात् जीवात्मा ! जीवात्मा और परमात्मा के एक हो जाने पर तत्त्वज्ञान होता है ।
हाजरा कुछ देर में घर से निकलकर बरामदे में जा बैठे ।
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श्रीरामकृष्ण - (मास्टर आदि से) - वह बस तर्क करता है । अभी देखते ही देखते खूब समझ गया, परन्तु थोड़ी देर बाद फिर जैसे का तैसा !
“बड़ी मछली को जोर से खींचते हुए देखकर मैं डोर ढीली कर देता हूँ । नहीं तो डोर तोड़ डालेगी और डोर पकड़नेवाला भी पानी में गिर जायगा । इसलिए मैं कुछ कहता नहीं ।
(क्रमशः)

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