सोमवार, 4 अक्टूबर 2021

*कील स्वामीजी*

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*शब्द सुरति लै सान चित्त, तन मन मनसा मांहि ।*
*मति बुद्धि पंचों आतमा, दादू अनत न जांहि ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*कील स्वामीजी*
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*स्वइच्छा भीषम गमन,*
*त्यूं कील करण त्याग्यो शरीर ॥*
*रात दिवस हरि भजै, पलक नहिं अंतर पारै ।*
*जेते प्राणी भूत, नाइ शिर पाप निवारे ॥*
*नाग डसा त्रय बार जहर नहिं चढ्यो लगारा ।*
*सांख्य योग मजबूत, चले व्है दशवें द्वारा ॥*
*राघव बल परब्रह्म के, सुत सुमेरुदे सरस धीर ।*
*स्वइच्छा भीषम गमन,*
*त्यूं कोल करण त्याग्यो शरीर ॥१८१॥*
जैसे भीष्मजी ने स्वेच्छा से ही शरीर छोड़ा था वैसे ही कीलकरण जी ने स्व-इच्छा से ही उत्तरायण आने पर शरीर छोड़ा था ।
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आप रात दिन हरि-भजन करते थे । एक पलक भी भजन में अन्तराय नहीं पड़ने देते थे ।
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जितने भी भूत प्राणी हैं उन को भगवद् बुद्धि से मस्तक नमाकर पाप हटाते थे ।
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एक दिन प्रातः काल भगवान् की पूजा करते समय मालाओं की टोकरी से माला लेने के लिये उसमें हाथ डाला । उसमें शीतलता और सुगन्धि के लिये एक काला सर्प आकर बैठ गया था । उसने हाथ में काट लिया । फिर भी हाथ उसके मुख के पास ले जाकर आपने कहा - फिर काट ले, तेरा विष राम कृपा से मेरे नहीं चढ़ेगा । इस प्रकार तीन बार कटाया किन्तु उन के लेशमात्र भी विष नहीं चढा ।
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आप सांख्य और योग दोनों ही शास्त्रों में दृढ़ थे । दशम द्वार से ही आपका जीवात्मा निकल कर परमात्मा में मिला था ।
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सुमेरुदेव के पुत्र कीलकरण बड़े धीर और भक्ति रस से युक्त होने से सरस थे ।
(क्रमशः)

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