सोमवार, 4 अक्टूबर 2021

*१९. मधि कौ अंग ~ ५/८*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१९. मधि कौ अंग ~ ५/८*
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नां हम हिंदू ना तुरक, नां हम इत्त१० न उत्त११ ।
हम निरपख निरमल भगत, जगजीवन रस रत्त ॥५॥
(१०. इत्त=इधर) (११. उत्त=उधर)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि ना तो हम हिंदू हैं ना हम मुसलमान हैं ना हम इधर हैं ना हम उधर हैं, हम तो निर्पक्ष व निर्मल राम रस में आनंदित होनेवाले भक्त हैं ।
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रांम रांम कहाँ रांम है, आदि अंत मधि एक ।
कहि जगजीवन उभै मत, उतपति आंन अनेक ॥६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हम राम की खोज करते हैं राम कहाँ हैं ? वह तो आरम्भ, मध्य व अंत तक एक जैसा है । और दूसरे मत में उसकी उत्पत्ति कितने ही स्थानों की बताते हैं ।
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आडै आसण कूंच हरि, मारग चलत मुकाम ।
कहि जगजीवन मद्धि घर, निहचल आसण रांम ॥७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि कोइ तो राम जी का निवास कठिन बताते हैं जिसे आडा आसन कहा उसै कोइ कहता है कि प्रभु मार्ग की मंजिल तो राह चलते ही मिल जाती है । संत कहते हैं कि मध्यम मार्ग पर ही निश्चल आसन पर राम का निवास है ।
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पीपल१ प्रीति लगाइ हरि, प्यावै अमीरस प्रांन ।
कहि जगजीवन अंबुसुत२, अम्रित स्त्रवैं ससि भांन ॥८॥
{१. पीपल=अश्वस्थ वृक्ष(योगवृक्ष एवं बोधिवृक्ष की ओर संकेत है।)} {२. अंबुसुत=कमल(हृत्कमल)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि पीपल वृक्ष से प्रभु को प्यार है । और वे उसे अमृत पान कराते हैं, जिससे वह प्राणवायु दे पाता है । इसी प्रकार कीचड़ में रहकर भी कमल उससे पृथक रहता है । उसका पालन सूर्य चंद्र करते हैं ।
(क्रमशः)

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