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*श्रम न आवै जीव को, अनकिया सब होइ ।*
*दादू मारग मिहर का, बिरला बूझै कोइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ विश्वास का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*प्रयागदासजी*
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*मूल छप्पय –*
*सौरभ१ स्वामि प्रसाद से,*
*पण व्रत रह्यो प्रयाग को ॥*
*मन वच कर्म भगवंत,*
*उभय अंध्री२ उर भाये ।*
*लीला में निर्यान३, भाव तन दोय दिखाये ॥*
*संतन सरस सनेह, मान दोऊ दल४ लीया ।*
*अंक ‘बलीयो’ ‘आड़’,*
*महोच्छा पूररण कीया ॥*
*'ओली' ध्वजा चढावहीं,*
*'क्यारे' कलश सु भाग को ।*
*सौरभ स्वामि प्रसाद से,*
*पण व्रत रह्यो प्रयाग को ॥१९०॥*
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स्वामी अग्रदास१ जी के कृपा-प्रसाद से उनके शिष्य प्रयागदासजी का भक्ति आदि की प्रतिज्ञा रूप व्रत पूरा हो गया था ।
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वे मन, वचन और कर्म से भगवत् परायण ही रहे थे । भगवान् के दोनों चरण२ इनके हृदय को प्रति प्रिय लगते थे । भावुकों के भाव का पोषण करने के लिए आपने अपने दो शरीर सब को दिखाये थे ।
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संतों के सुन्दर स्नेह से एक ही दिन के दो निमन्त्रण४ ‘आडा’ और ‘बलिया’ दोनों ग्रामों से आये हुये मान लिये थे । एक ही दिन एक शरीर से दोनों उत्सवों में कैसे जा सकेंगे और एक के जाने से दूसरे नाराज होंगे । तब आप दोनों ग्रामों के अंक(मध्य) में बैठ गये और दोनों उत्सव वालों को कहा - इसी स्थान से दोनों ओर पंगति बैठा दो और दोनों ओर से पूरी प्रसाद परसते आओ । मैं दोनों उत्सवों में एक साथ ही प्रसाद पाऊंगा । लोगों ने कहा - दोनों ग्रामों में कोस भर का अन्तर है । इतनी पंगति के लिये प्रसाद पूरा नहीं पड़ेगा । आपने कहा गुरु प्रताप से सब पूरा पड़ जायगा । लोगों ने वैसा ही किया । प्रसाद की कमी नहीं आई ।
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इसके पश्चात् 'क्यारे' ग्राम में भगवत् मन्दिर के कलश चढाने का उत्सव था और 'ओली' ग्राम में सन्त सेवा की ध्वजा गाड़ने का उत्सव था । दोनों स्थानों से एक ही दिन का निमन्त्रण आया तब प्रयागदासजी दो रूप धारण करके दोनों उत्सवों में गये थे ।
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ओली में ध्वजा, चढाई और क्यारे में कलश चढाया । पीछे दोनों ग्राम के भक्तों को जब रहस्य का पता लगा तो वे अपने भाग्य की प्रशंसा करने लगे । अन्त समय रास लीला में भगवत् दर्शन करते हुए शरीर छोड़कर भगवत् धाम को प्राप्त हुए थे ।
(क्रमशः)

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