गुरुवार, 28 अक्टूबर 2021

*नाम विवेक का अंग १६५(५/७)*

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*गुणातीत सो दर्शनी, आपा धरै उठाइ ।*
*दादू निर्गुण राम गहि, डोरी लागा जाइ ॥*
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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*नाम विवेक का अंग १६५*
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सब सुकृत१ ले ज्ञान सौ, करहु नाम सौं सीर२ ।
ज्यों धृत शक्कर कणक३ सौं, लाडू बाँधहि वीर४ ॥५॥
जैसे धृत, शक्कर, और गेहूं३ से लड्डू बाँधते हैं । वैसे ही हे भाई४ ! ज्ञान द्वारा सभी पुण्य१ कर्मों को अपनाते हुये नाम चिंतन में साझा२ करो, अर्थात ज्ञान पूर्वक पुण्य कर्म करते हुये प्रभु के नाम का चिंतन करो ।
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सफल गवें१ शोध्यों२ बँधै, यथा अकलि में राग ।
त्यों रज्जब सुकृत सबै, विधि विचार लै लाग ॥६॥
जैसे गायक१ के सब स्वर विचार२ पूर्वक पहचान लिये जाते हैं तब बुद्धि में राग बँध जाती है, अर्थात ज्ञात हो जाता है कि - अमुक राग गा रहा है वैसे ही वेदादि शास्त्र की विधि के विचार में वृत्ति लगती है तब सभी पुण्यकर्म बुद्धि में ठीक ज्ञात होने लगते हैं । अत: उनके साथ ही विचार पूर्वक प्रभु का नाम चिंतन करते रहना चाहिये ।
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गहरे ज्ञान समुद्र में, चलै नाम की नाव ।
रज्जब रज१ लागे नहीं, मिटै तपति के ताव२ ॥७॥
जैसे गहरे समुद्र में नौका चलती है, तब नीचे रेत१ नहीं लगती और ऊपर सूर्य की तप्त भी नहीं लगती, वैसे ही पूर्ण ज्ञान में नाम चिंतन चलता है वहाँ नाम चिंतन से भेद होने की शंका रूप रेत नहीं लगती और भेद से होने वाला दु:ख२ भी नहीं होता । उक्त बातें अधूरे ज्ञान वालों में ही होती है ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित नाम विवेक का अंग १६५ समाप्तः ॥सा. ५०९३॥
(क्रमशः)

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