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*परमेश्वर के भाव का, एक कणूँका खाइ ।*
*दादू जेता पाप था, भ्रम कर्म सब जाइ ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *॥ ६ प्रार्थना भक्ति ॥*
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*॥ सन्त अन्त्यज के हाथ के प्रसाद से भी घृणा नहीं करते ॥*
करें घृणा न प्रसाद से, जो हो सन्त महान ।
भंगिनी से ली पकौड़ी, व्यासदास मतिमान ॥१६२॥
दृष्टांत कथा – ओड़छा ले जाने के लिये लोग व्यासदासजी के पीछे पड़े थे । गोविन्ददेवजी के मन्दिर से भंगिनी आ रही थी । व्यासदासजी ने पूछा – 'तेरे पास क्या है ?' भंगिनी – 'भगवान् और भक्तों का प्रसाद । व्यासदासजी दौड़े और उसकी टोकरी से एक पकोड़ी उठा कर खा गये । इससे ओड़छे नरेश आदि ने उन्हें भ्रष्ट जान कर ओड़छे ले जाने का विचार छोड़ दिया । इससे सूचित होता है कि महान् सन्त अन्त्यज के हाथ के महाप्रसाद से भी घृणा नहीं करते ।

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