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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२०. सारग्राही कौ अंग ~ ३३/३६*
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सकल बस्त संगति लहै, सांई सनमुख होइ ।
कहि जगजीवन प्रीति सौं, रांम रटै जे कोइ ॥३३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि संसार में सभी वस्तुओं पर संगति का रंग चढता है, जब वे प्रभु सन्मुख होते हैं। संत कहते हैं अतः प्रेमपूर्वक हरि स्मरण करें ।
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कहि* जगजीवन वेद मंहि, गीता ग्यांन उपाइ ।
रांम रटै जन रांम लहै, रांम हि मांहि समाइ* ॥३४॥
(*=*. महात्मा कहते हैं=यदि साधक वेद के वचनों को भगवद्गीता के उपदेश से समन्वित कर साधना करे तो वह, समय आने पर, इस साधना के बल पर परमात्मा में लीन हो सकता है ॥३४॥)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो राम नाम का स्मरण करते हैं वे राम ही प्राप्त कर लेते हैं । और राम में ही समाते हैं । जैसे वेद वचन व गीता की समन्वय साधना से परमात्मा में लीन हो मोक्ष को पाता है ।
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जे रांम ह्रिदै रमि राखिये, रसनां रटिये रांम ।
कहि जगजीवन रांम घरि, अठ सिधि नौ निधि नांम ॥३५॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो राम को हृदय में रमा लेते हैं और जिह्वा से राम रटते रहते हैं वे राम जी के घर में अष्ट सिद्धि नव निधि पाते हैं ।
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सत* मति हारै, स्वाद तजि, सुमिरन मांहि समाइ ।
कहि जगजीवन रांम धन, कीजै बहुत कमाइ* ॥३६॥
{*=*. यदि साधक सन्मार्ग(सदाचार पालन) का त्याग न करे, विषय सुख के प्रलोभन में न पड़े और भगवान् का निरन्तर भजन करता रहे तो इस कारण प्राप्त हुए रामधन से उस को बहुत कुछ भौतिक एवं आध्यात्मिक लाभ(कमाई) हो सकता है ॥३६॥}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि यदि जीव सन्मार्ग पर चले, विषय सुख से लालायित न हो तो इस प्रकार राम कृपा रुपी धन से उसे भौतिक व अध्यात्मिक लाभ होता है ।
(क्रमशः)

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