गुरुवार, 14 अक्टूबर 2021

*१९. मधि कौ अंग ~ ४१/४४*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१९. मधि कौ अंग ~ ४१/४४*
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पख पूजा प्रव्रिति धसै, निव्रिति नांम निवास ।
रांम पिछांणै रांम रटि, सुकहि जगजीवनदास* ॥४१॥
(*=*, महात्मा कहते हैं=भले ही मुसलमान रोजा एवं नमाज के या हिन्दू एकादशी व्रत या मूर्तियों के सम्मुख दण्डवत् प्रणाम के चक्कर में पड़े रहें, परन्तु वास्तविक हरिभक्ति तो गुरूपदेश के माध्यम से हरिनाम जप से ही पूर्ण होती है । ये पर्वविशेष की पूजाएँ मानव को प्रवृत्तिमार्ग में ही ढकेलती हैं । संसार से निवृत्ति का मार्ग तो एकमात्र नामसाधना ही है ॥४०=४१॥)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि पक्ष पूजा अर्चना में ही लगे रहे तो इससे संसार में प्रवृत्ति तो बढेगी किन्तु निवृत्ति तो नाम स्मरण से ही होती है । राम को पहचान कर गुणानुवाद करने से ही मोक्ष मिलता है ।
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केइ मसीत केइ देहुरे, केइ मसांण केइ गौर ।
कहि जगजीवन हरि भगत२, धर गये गौर न सौर२ ॥४२॥
(२=२. हरि भगत धर गये गौर न सौर=हरिभक्त को पवनदाह हेतु एकान्त स्थान में रख दिया जाता है । उसे उसे कब्र की या 'राम नाम सत है' की आवश्यकता नहीं है)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हरि भक्तों को मस्जिद, मन्दिर, श्मशान, पवनदाह, इन सब की आवश्यकता नहीं होती है ।
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केइ१ कागद स्याही कलम१, केइ अबीर२ केइ नाद३ ।
कहि जगजीवन हरि भगत, केइ बाद४ केइ स्वाद५ ॥४३॥
(१=१. कोई भक्तिशास्त्र पर ग्रन्थ लिखना) (२. अबीर=गणेश, हनुमान आदि की मूर्तियों पर सिंदूर लगाना) (३. नाद=योगसाधना) (४. वाद=हरिकथा करना) (५. स्वाद=हरिमूर्ति को नैवैद्य चढ़ाना ही भगवत्सेवा समझते हैं)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि कोइ भक्ति शास्त्र लिखना कोइ सिन्दूर आदि चढाकर पूजा करना कोइ योग साधना कोइ कथा व कोइ प्रसाद नैवैद्य चढाकर ही प्रभु को प्रसन्न करते हैं ।
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केइ बूझैं केई नहिं बूझैं, केइ सूझैं केइ अंध ।
कहि जगजीवन हरि भगत, रांम बिना जग धंध ॥४४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि कोइ जानते हैं,कोइ नहीं जानते हैं, किन्हें परमात्मा सूझता है, कितने ही दृष्टि हीन हैं, संत कहते हैं कि प्रभु भक्तों को प्रभु के बिना यह संसार बोझ वाला व्यापार दिखता है ।
(क्रमशः)

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