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*साधु जन संसार में, भव - जल बोहित अंग ।*
*दादू केते उद्धरे, जेते बैठे संग ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*दिवाकरजी*
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*मूल छप्पय -*
*अँधेर अज्ञता नाशने, उदित दिवाकर दूसरो ॥*
*प्रबोधे सु भूराज, नहीं को आज्ञा मेटै ।*
*पक-पादप की न्याय, संत पोषन ले भेटै ॥*
*सब पै छाया कृपा, गिरा भोला यू बोलै ।*
*सुमरे रघुपति नित्य, साधु के अंध्री खोलै ॥*
*काश्यप कर्मचंद सुत सुहृद, वर्षै ऊसर सूसरो ।*
*अँधेर अज्ञता नाश ने, उदित दिवाकर दूसरो ॥१८७॥*
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मूर्खता रूप अंधेरे को नष्ट करने के लिये अग्रदास जी के शिष्य दिवाकरजी दूसरे सूर्य ही उदय हुये थे ।
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आपने पृथ्वी के राजाओं को भी सुन्दर उपदेश दिया था । आप पके फल वाले वृक्ष के न्याय से अर्थात् जैसे पके फल वाला वृक्ष अपने आप ही फल देता है वैसे ही जो अपने आप ही भेंट देते थे, वह भेंट सन्तों के पोषण करने के लिए लेते थे.....
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और जैसे वृक्ष सब को छाया प्रदान करता है वैसे ही आप सब पर कृपा करते थे । बोलते समय हे भोला ! ऐसा बोला करते थे अथवा विद्वान् होकर भी भोले मनुष्य के समान सरलता से बोलते थे । सदा रघुपति रामजी का स्मरण करते थे । सन्तों के चरण धोया करते थे ।
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अनन्तानन्दजी के शिष्य कर्मचन्द जी के पुत्र दिवाकरजी जैसे सूर्य अपनी किरणों से ऊसर और उर्वरा दोनों प्रकार की भूमि पर वर्षते हैं वैसे ही सुहृदयता पूर्वक सब को ही सुख प्रदान करते थे ।
(क्रमशः)

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