शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2021

*१९. मधि कौ अंग ~ ४५/४८*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१९. मधि कौ अंग ~ ४५/४८*
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केइ जांणी केई नहिं जांणी, केई वाणी कहि बात ।
कहि जगजीवन हरि भगत, तन मंहि बरतै तात ॥४५॥
संतजगजीवन जी कहतें है कि कोइ जानता है कोइ अनजान है कोइ स्वयं व कोइ अनुभव की कहते हैं किंतु प्रभु भक्त तो देह में ही परमपिता परमात्मा को अनुभव करते हैं ।
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कहि जगजीवन रांमजी, द्वै पष मद्धि निवास ।
हिन्दु तुरक अक्शर इलम, हरि जन हरि की प्यास ॥४६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि है प्रभु द्वैत व अद्वैत दोनों पक्षों के मध्य प्रभु का निवास है । हिन्दू मुसलमान, अक्षर हुनर इन सब को छोड़कर प्रभु भक्तों की तृषा पूर्ति तो प्रभु है ।
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हद बंधी बूझी हरफ, न वो ओं अलफ न वो ओं अंक ।
कहि जगजीवन सुन्नि मिलि, दस में दोइ क्रित कंक ॥४७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि शब्दों की सीमा से शब्द परिचय होता है वे सिर्फ शब्द या अंक ही नहीं है । एक शून्य किसी भी अंक मे लगकर उसे एक से दो कर देती है जबकि शून्य का स्वतंत्र कोइ सांख्यिकीय महत्व नहीं होता ।
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ग्यारस बारस उभै तिथि, तेरस चौदस च्यारि ।
कहि जगजीवन पूरनिमा, पंडित करौ बिचारि ॥४८॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि ग्यारस व बारस दो तिथि, तेरस चतुर्दशी फिर पांचवीं तिथि मिलते ही पूर्ण हो जाती है पूर्णिमा । ये शरीर भी पंच भूतों से बना है ।
(क्रमशः)

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