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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१९. मधि कौ अंग ~ १७/२०*
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और* उरै जनमै मरै, मरघट गौर मासांण* ।
कहि जगजीवन असली बंदा, निरपख आसिक जांण ॥१७॥
(*=*. कोई अभी जन्मा ही नहीं है, किसी का जन्म हो चुका है, कोई मर रहा है, कोई मर कर मरघट श्मशान तथा कब्र तक पहुँच चुका है ॥१७॥)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि कोइ अभी अजन्मा है । किसी का जन्म हो चुका है कोइ मर रहा है और कोइ मरकर श्मशान पहुंच गया है । संत कहते हैं कि असली बंदा तो वह है जो निष्पक्ष भाव से ईश्वर का प्रेमी है ।
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प्रश्न : कै तुम निरगुण ? गुण धर्यौ ? कै तुम सबदक सुंनि२ ?।
कै तुम घटि घटि बोलतां ? कै तुम पकड्यौ मुंनि३ ?॥१८॥
{२. सुंनि=शून्य(भाव अभाव से रहित)} {३.मुंनि=मौन व्रत(चुप रहना)}
संतजगजीवन जी कहते हैं, प्रश्न है कि क्या तुम निर्गुण भक्ति के हो या सगुण ? क्या तुम शास्त्र सुनकर या तुम सर्वव्यापक के मत वाले हो या तुम मौन योगी हो ।
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उत्तर : ना हम निरगुण गुण धर्यौ, ना हम सबदन सुंनि ।
ना हम घटि घटि बोलता, ना हम पकड्यो मुंनि ॥१९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि ना हम निर्गुण हैं ना हम सगुण हैं, ना शास्त्र श्रोता हैं ना हम घट घट में व्याप्त होकर बोलते हैं, ना हम मौनी योगी हैं ।
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सोहं हंसा खोजतां४, जुग अनेक चलि जाइ ।
जगजीवन सो रांम रस, मद्धि निरंतर पाइ ॥२०॥
(४. सोहं हंसा खोजतां=योग साधना करते हुए)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो हमारा वास्तविक रूप है जो प्रभु प्रदत्त है वह हंस के समान है उसे ढूढंने में युग ही बीत गये वह रामरस मध्यममार्ग में निरंतर मिलता रहता है ।
(क्रमशः)

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