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*दादू तज संसार सब, रहे निराला होइ ।*
*अविनाशी के आसरे, काल न लागे कोइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ सजीवन का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*यूं हरि प्रीति लिइ मृत्यु जीत,*
*सनातन रीति सु पूजन कीजे ।*
*फूलन हार पिटारि मझार,*
*डसा जब व्याल सु फेर कटीजे ॥*
*तीन ही बेर डसाई घिरे जन,*
*झैर चढ्यो नहि राम भजीजे ।*
*संत सभा महि बैठ मिले प्रभु,*
*योग कला ब्रह्म रंध्र भनीजे१ ॥१७५॥*
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कीलदेव जी ने परमात्मा में ऐसी प्रीति की थी कि अपनी मृत्यु को भी जीत लिया था । एक दिन सदा की भांति सुन्दर रीति से प्रभु का पूजन कर रहे थे ।
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मालाओं की पिटारी में से माला लेने के लिये हाथ डाला तो उसमें बैठे हुये काले सर्प ने इनके हाथ में काट लिया । आपने कहा - ले और काट ले, तेरा विष रामकृपा से मेरे नहीं चढ़ेगा । उसने फिर काट लिया ।
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इस प्रकार तीन बार काटा । फिर लोगों ने आकर इनको घेर लिया किन्तु इनके लेशमात्र भी विष नहीं चढा । कारण - ये तो राम भजन करते थे । फिर कालान्तर में जब आपने अपनी इच्छा से ही रामधाम को जाना चाहा,
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तब सन्तों की सभा के मध्य बैठकर योग-कला द्वारा दशम द्वार को भेदन करके प्रभु के स्वरूप में मिल गये थे । ऐसा ही संत कहते१ हैं ।
(क्रमशः)

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