🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
https://www.facebook.com/DADUVANI
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
.
*१९. मधि कौ अंग ~ ४९/५२*
.
रांम पिछांणै रांम कहि, रांम बिचारै देह ।
कहि जगजीवन ते लहैं, अरथ अनुपम येह ॥४९॥
संतजी जी कहते हैं कि राम की महिमा जानकर जो राम कहते हैं और देह में ही राम विचारते हैं कि इस देह को चलाने वाले राम हैं । जो ऐसा समझते हैं उन्हें ही इस राम शब्द का सुन्दर महत्व पता चलता है ।
.
कहि जगजीवन अकह कहै, अगह गहै गुर ग्यांन ।
रांम सुमरि रांमहि मिलै, चित न आवै आंन ॥५०॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो न कहा गया वह कहना जिसने कभी कुछ ग्रहण न किया हो वह गुरु ज्ञान ग्रहण करें वो जन प्रभु या राम का नाम सिमर कर राममय ही हो जाते हैं । अन्य कोइ उनके ध्यान मे भी नहीं आता है ।
.
विस्वा६ टालि विस्व७ घरि, वैष्णौ८ बचन बिलोकि ।
कहि जगजीवन विश्व गुरु, बार बार हरि कोकि९ ॥५१॥
(६. विस्वा=एक छोटा भूखण्ड) (७. विस्व=समस्त ब्रह्माण्ड को अपना घर समझता हुआ) (८. वैष्णौ=हरिभक्त) {९. कोक=चक्रवाक(चकवा) पक्षी के समान}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो थोड़ी सी पृथ्वी को ही अपना घर नहीं मानते पूरा विश्व उनका घर होता है । वे विश्व गुरु होकर भी प्रभु स्मरण चकवे की भांति करते रहते हैं ।
.
अम्रित अमीरस प्रेम जल, कुंडलनी मध्य कूंड ।
कहि जगजीवन बिराजत, संत मंडली कूंड ॥५२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि अमृत जैसा अमीरस हो जो आनंद है । और हमारी कुणडिलनी मध्य स्थित है वहीं उस कुंद में संत मण्डली विराजते हैं ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें