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*अरस परस मिल खेलिये, तब सुख आनंद होइ ।*
*तन मन मंगल चहुँ दिशि भये, दादू देखे सोइ ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *॥८ सख्य भक्ति॥*
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*॥ सखा भक्त के साथ हरि खेलते भी हैं ॥*
सखा भक्त के साथ में, खेलत हैं भगवान् ।
भोग थाल गोविन्द हरा, पूजक हुआ मलान ॥१८९॥
दृष्टांत कथा – एक दिन भगवत् भोग के लिये पुजारी थाल ले जा रहा था । बीच में ही गोविन्द स्वामी ने थाल छीन कर सब सामग्री खाली । पुजारी ने गोसांईजी से कहा, उन्होंने गोविन्द स्वामी से पूछा – 'ऐसा क्यों किया ।' गोविन्द स्वामी – तुम लोग अपने लाला को अच्छे २ भोजन खिलाकर खेलने और लड़ने के लिये तैयार कर देते हो । वह मेरे से पहले ही तैयार होकर बन में चला जाता है ।
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मुझे भोजन पीछे मिलाता है, मैं फिर उसे बन में खोजता फिरता हूं । इसलिये आज मैंने सोचा कि उससे पहले मैं ही भोजन करके तैयार क्यों न रहूँ । गुसांईजी उनके भाव को जान कर बड़े प्रसन्न हुये और पुजारियों से कहा – 'गोविन्दस्वामी की प्रसन्ता ही भगवान् की प्रसन्ता हाई ।' इससे सूचित होता है कि भगवान् सखा भक्तों के साथ खेलते भी हैं ।

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