शनिवार, 27 नवंबर 2021

*जितेन्द्रिय किस तरह हुआ जाय*

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*दादू माया बैरिण जीव की, जनि कोइ लावे प्रीति ।*
*माया देखे नरक कर, यह संतन की रीति ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ माया का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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नारायण आये हुए हैं । वे भी जमीन पर बैठे हैं ।
श्रीरामकृष्ण - (प्रियनाथ से) - क्यों जी, तुम्हारा हरि तो बडा अच्छा है ।
प्रियनाथ - ऐसा अच्छा क्या है - परन्तु हाँ, लड़का है ।
नारायण - अपनी स्त्री को उसने माँ कहा है ।
श्रीरामकृष्ण - यह क्या ! मैं ही नहीं कह सकता और उसने माँ कहा !
(प्रियनाथ से) बात यह है कि लड़का बड़ा शान्त है, ईश्वर की ओर मन है ।
श्रीरामकृष्ण दूसरी बात करने लगे ।
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श्रीरामकृष्ण - सुना तुमने, हेम क्या कहता था ? बाबूराम से उसने कहा, ईश्वर ही एक सत्य हैं और सब मिथ्या । (सब हँसते हैं ।) नहीं जी, उसने आन्तरिक भाव से कहा था । और मुझे घर ले जाकर कीर्तन सुनाने के लिए कहा था, परन्तु फिर हो नहीं सका । सुना उसके बाद कहता था - 'मैं अगर ढोलकरताल लूँगा तो आदमी क्या कहेंगे ?’ डर गया कि कहीं आदमी पागल न कहें ।
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"हरिपद घोषपाड़ा की एक स्त्री के फेर में पड़ गया है । छोडता नहीं ! कहता है, गोद में लेकर खिलाती है । सुनो, कहता है, उसका गोपाल-भाव है । मैंने तो बहुत सावधान कर दिया है । कहता तो वात्सल्यभाव है, पर उसी वात्सल्य से फिर नीच भाव पैदा होते हैं ।
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"बात यह है कि स्त्री से बहुत दूर रहना पड़ता है, तब कहीं ईश्वर के दर्शन होते हैं । जिनका अभिप्राय बुरा है, उन सब स्त्रियों के पास का आना-जाना या उनके हाथ का कुछ खाना बहुत बुरा है । ये सत्त्व हरण करनेवाली हैं ।
"बड़ी सावधानी से रहने पर तब कहीं भक्ति की रक्षा होती है ।
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भवनाथ, राखाल इन लोगों ने एक दिन अपने हाथ से भोजन पकाया । सब के सब भोजन करने बैठे, उसी समय एक बाउल उन लोगों की पाँत में बैठ गया और बोला, मैं भी खाऊँगा । मैंने कहा, फिर पूरा न पड़ेगा । अगर बच जायेगा तो तुम्हें दिया जायेगा । परन्तु वह गुस्से में आकर उठकर चला गया ।
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विजया के दिन चाहे कोई भी आदमी अपने हाथ से खिला देता है, यह अच्छा नहीं है । शुद्धसत्व भक्त हो, तो उसके हाथ का खाया जा सकता है ।
"स्त्रियों के पास बड़ी होशियारी से रहना चाहिए । गोपालभाव है, इस तरह की बातों पर बिलकुल ध्यान न देना चाहिए । स्त्रियों ने तीनों लोक निगल रखे हैं । कितनी स्त्रियाँ ऐसी हैं जो बढ़ती उम्र का लड़का देखकर नया जाल फैलाती हैं । इसीलिए गोपाल-भाव है ।
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"जिन्हें कुमार-अवस्था में ही वैराग्य होता है, जो बचपन से ही ईश्वर के लिए व्याकुल होकर घूमते हैं, उनकी श्रेणी एक अलग है । वे शुद्ध-कुलीन हैं । ठीक-ठीक वैराग्य के होने पर वे औरतों से पचास हाथ दूर रहते हैं, इसलिए कि कहीं उनका भाव भंग न हो । वे अगर स्त्रियों के फेर में पड़ जायँ, तो फिर शुद्धकुलीन नहीं रह जाते, भग्नभाव हो जाते है, फिर उनका स्थान नीचा हो जाता है । जिनका बिलकुल कौमार-वैराग्य है, उनका स्थान बहुत ऊँचा है, उनकी देह में एक भी दाग नहीं लगा ।
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"जितेन्द्रिय किस तरह हुआ जाय ? अपने में स्त्री-भाव का आरोप करना पड़ता है । मैं बहुत दिनों तक सखीभाव में था । औरतों जैसे कपड़े और आभूषण पहनता था, उसी तरह सारी देह भी ढकता था । नहीं तो स्त्री(पत्नी) को आठ महीने तक पास रखा कैसे था ? - हम दोनों ही माँ की सखियाँ थे ।
"मैं अपने को पु(पुरुष) नहीं कह सकता ।
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एक दिन मैं भाव में था, उसने(श्रीरामकृष्ण की धर्मपत्नी ने) पूछा- 'मैं तुम्हारी कौन हूँ ?' मैंने कहा - 'आनन्दमयी ।' एक मत में है, जिसके स्तन-स्थान में घुण्डी हो, वह स्त्री है । अर्जुन और कृष्ण के घुण्डियाँ न थीं ।
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"शिवपूजा का भाव जानते हो ? शिवलिंग की पूजा मातृस्थान और पितृस्थान की पूजा है । भक्त यह कहकर पूजा करता है - 'भगवान्, देखो, अब जैसे जन्म न लेना पड़े । शोणित, शुक्र के भीतर से मातृस्थान से होकर अब जैसे न आना हो ।’”
(क्रमशः)

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