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*आप अकेला सब करै, औरों के सिर देइ ।*
*दादू शोभा दास को, अपना नाम न लेइ ॥*
*आप अकेला सब करै, घट में लहरि उठाइ ।*
*दादू सिर दे जीव के, यों न्यारा ह्वै जाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ समर्थता का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*लेन खिनाय दिये पतिस्या भृत,*
*ज्याय१ दियो द्विज यूं कहि सूबा ।*
*चाहत देखन ल्याव भली विधि,*
*जात विनै करि यूं पग धूबा२ ॥*
*भूप मिले चलि ऊपरि लेवत,*
*दे बहुमान कहै तुम खूबा ।*
*द्यौ अजमत्त३ सुनी अति गत्ति हि,*
*राम करै हम से नहिं हूवा ॥१८४॥*
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जब आपकी कृपा से ब्राह्मण जी उठा तब आपका सुयश चारों घोर फैल गया। यह बात दिल्ली के बादशाह ने भी सुनकर आपका दर्शन करने के लिये, दूतों को काशी के सूबेदार के पास यह कहकर भेजा कि...
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जिन साधुजी ने मरे हुए ब्राह्मण को जीवित किया है, उनको भली प्रकार यहां लाओ। हम उनका दर्शन करना चाहते हैं। सूबेदार, तुलसीदासजी के पास गया और उनके चरण छूकर के दिल्ली पधारने की प्रार्थना की।
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आपके स्वीकार करने पर आपको बादशाह के पास दिल्ली पहुँचा दिया। बादशाह कुछ आगे चलकर आप से मिले और ऊपर लेजाकर ऊंचे आसन पर बैठाकर, बहुत सन्मान करते हुये मधुर वाणी से बोला- आप अति श्रेष्ठ हैं।
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मैंने सुना है, आपकी चेष्टा बड़ी विचित्र है। आपने मृतक को भी जीवित कर दिया है। अतः मुझे भी कोई करामात दिखा दीजिये। तुलसीदासजी ने कहा- वह तो भगवान् राम ने ही किया है, मुझसे तो कुछ भी नहीं हुआ है।
(क्रमशः)

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