गुरुवार, 11 नवंबर 2021

*२१. बिचार कौ अंग ~ १/४*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२१. बिचार कौ अंग ~ १/४*
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तात्परज१ सब ग्रंथ को, रांम नांम निज सार ।
कहि जगजीवन साध मुनि, सुर नर करैं बिचार ॥१॥
{१. तात्परज=तात्पर्य(अभिप्राय=आशय)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सब ग्रन्थों का सार यही है कि राम नाम स्मरण ही सार्थक है । और सभी साधु मुनि देव भी इसी मत पर विचार करते हैं ।
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सवत्तर२ हरि रांमजी, क्षर अक्शर सुत्र सार ।
कहि जगजीवन ए चंमन३ मैं, आतम भोमि बिचार ॥२॥
{२. सबत्तर=सर्वत्र(सब जगह)} {३. चमन=चमन(फुलवारी)}
संतजगजीवन जी कहते हैं सर्वत्र हरि, रामजी, वर्ण, अक्षर शब्द सूत्रों का सार ये दो शब्द ही है । संत कहते हैं कि इस संसार रुपी फुलवारी को ही मत देख जहाँ से यह जन्मी है उस परमात्मा रुपी भूमि का भी विचार करो ।
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बिरह विवेक बिचार तहां, जहाँ रांम हरि नांम ।
कहि जगजीवन मोह महादल, दूरि करै भजि रांम ॥३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि विरह विवेक से वहां विचार करे कि हम उस प्रभु के कितने विरही है जहाँ हरि या राम स्मरण होता है । हम मोह में ही स्वंय को उलझाये हैं । राम नाम का भजन करके इस मोह रुपी दलदल से निकल सकते हैं ।
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असंख्य जोनि माँहि मनुष तन, सब कै सिरै सरीर ।
मनुष देह धरि रांम कहै, पीवै अम्रित नीर ॥४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि असंख्य योनियों में मनुष्य योनि हैं फिर उसमें भी इस नर तन को पाना बहुत दूर या अंतिम छोर की बात है । जो मनुष्य देह धर कर राम सिमरते हैं, वे सच में अमृत जल पान करते हैं ।
(क्रमशः)

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