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*प्रेम भक्ति जब ऊपजै, पंगुल ज्ञान विचार ।*
*दादू हरि रस पाइये, छूटै सकल विकार ॥*
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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*उपजणि का अंग १६६*
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राम उपाई१ काम की, अविहड़२ अविनाशी ।
जन रज्जब जिव की उपज, सब तिस३ की दासी ॥१३॥
राम ने भक्तों की बुद्धि में ज्ञान की उपज मुक्ति रूप कार्य को सिद्ध करने की युक्ति उत्पन्न१ की है जो अविनाशी ब्रह्म से अभेद२ करती है । ब्रह्मज्ञान से बिना जो भी जीव की उपज है, वे सब ब्रह्मज्ञान३ रूप उपज की दासी है ।
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एक उपजनी इन्द्र में, सकल उपज आधार ।
रज्जब उभय पिछानिये, एक एक की लार१ ॥१४॥
इन्द्र में वर्षा करके अन्न उत्पन्न करने की उपज है, वह सभी उपजों की आधार है । बिना भोजन अन्य सभी उपजों का होना असंभव है अत: इन दोनों उपजों को भली भांती पहचानना चाहिये । एक अर्थात अन्य सब प्राणियों की उपज एक इन्द्र की उपज के पीछे१ है ।
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एक धरे१ की उपजणी, लीये प्राणि अनेक ।
रज्जब उलटा२ एक सौं, इहिं३ उपजणि कोई एक ॥१५॥
एक तो मायिक१ संसार संबंधी उपज होती है, उससे युक्त तो अनेक प्राणी होते हैं किंतु दूसरी संसार से अपनी वृत्ति को बदल२ कर एक अद्वैत ब्रह्म से लगने की उपज है सो इस३ संसार में कोई एक अर्थात किसी बिरले व्यक्ति मे ही होती है ।
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बुरी ऊपज्यों बूड़ि है, भली ऊपज्यों भाग२ ।
रज्जब इक आनन्दमय३, दूजी४ दिल दुख दाग५ ॥१६॥
बुरी उपज होती है तो संसार सागर में डूबता१ है और ब्रह्म संबंधी अच्छी होती है तब भाग्य२ खुल जाता है । ब्रह्म३ संबंधी उपज आनन्द रूप होती है और बुरी४ उपज हृदय को दु:ख से जलाती५ रहती है ।
(क्रमशः)

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