शुक्रवार, 12 नवंबर 2021

*कामिनी-त्याग*

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*माया बहुरूपी नटणी नाचै, सुर नर मुनि को मोहै ।*
*ब्रह्मा विष्णु महादेव बाहे, दादू बपुरा को है ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ माया का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(३)कामिनी-त्याग*
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साधु दर्शन करके चले गये । श्रीरामकृष्ण, बाबूराम, मास्टर, मुखर्जियों के हरि आदि भक्त-समुदाय कमरे में और बरामदे में टहल रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण - (मास्टर से) - क्या तुम नवीन सेन के यहाँ गये थे ?
मास्टर - जी हाँ, गया था । नीचे बैठा हुआ सब गाने सुन रहा था ।
श्रीरामकृष्ण - यह तुमने अच्छा किया । वे लोग गये थे, केशव सेन क्या उनका चचेरा भाई है ?
मास्टर - कुछ अन्तर है ।
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नवीन सेन आदि, एक भक्त के ससुरालवालों के कोई सम्बन्धी हैं ।
मणि के साथ टहलते हुए एकान्त में श्रीरामकृष्ण उनसे बातचीत कर रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण - लोग ससुराल जाते हैं । मैंने कितना सोचा विवाह करूँगा, ससुराल जाऊँगा, आनन्द की साधें पूरी कर लूंगा; परन्तु क्या हो गया है ?
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मणि - जी, आप कहा करते हैं - 'लड़का अगर बाप का हाथ पकड़े तो वह गिर सकता है, परन्तु बाप अगर लड़के का हाथ पकड़े तो वह नहीं गिरता ।' आपकी बिलकुल यही अवस्था है । माता ने तो आपको सदा ही पकड़ रखा है ।
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श्रीरामकृष्ण - उलो के वामनदास के साथ विश्वास परिवार के यहाँ मुलाकत हुई थी । मैंने कहा, मैं तुम्हें देखने के लिए आया हूँ । जब चला आया, तब सुना, वह कह रहा था - 'बाप रे, बाघ जैसे आदमी को पकड़ता है, वैसे ही ईश्वर इन्हें पकड़े हुए हैं ?' तब वह नौजवान था - खूब मोटा था - सदा ही सेवाभाव रहता था ।
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"मैं औरतों से बहुत डरता हूँ । देखता हूँ, जैसे बाघिन खा जाने के लिए आ रही हो । और उसके अंग, प्रत्यंग और सब छेद बहुत बड़े बड़े दीख पड़ते हैं । उसके सब आकार राक्षसी-से दीख पड़ते हैं ।
"पहले बड़ा भय था । मैं किसी को पास न आने देता था । इस समय तो बहुत ही मन को समझाकर उन्हें माँ आनन्दमयी की एक मूर्ति देखता हूँ ।
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"भगवती का अंश तो है; परन्तु पुरुषों के लिए, विशेष कर साधुओं के लिए और भक्तों के लिए वह त्याज्य है ।
“चाहे ऊँचे दर्जे की भक्तिन हो, परन्तु स्त्री को मैं बड़ी देर तक अपने पास नहीं बैठने देता । थोड़ी ही देर में कहता हूँ, जाओ, ठाकुरजी का दर्शन करो, इस पर भी अगर वह न चली गयी, तो तम्बाकू पीने के बहाने मैं स्वयं ही उठकर चला जाता हूँ ।
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"देखता हूँ, किसी किसी का मन स्त्रियों की ओर बिलकुल ही नहीं जाता । निरंजन कहता है, मेरा तो मन स्त्रियों की ओर नहीं जाता ।
“हरि से मैंने पूछा, और उसने भी कहा था - ना, स्वियों की ओर मन नहीं जाता ।
"जो मन परमात्मा को दिया जाता है, उसका बारह आना स्त्री ले लेती है । फिर "लड़कों के होने पर प्रायः सब मन खर्च हो जाता है । इस तरह फिर परमात्मा के लिए क्या दिया जाय ?
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“स्वी की देखभाल करते करते किसी किसी के प्राणों पर आ बनती है । पांडेय जमादार बुड्डा है, पश्चिम का रहनेवाला है । उसकी स्त्री की उम्र चौदह साल की है । बूढ़े के साथ उसे रहना पड़ता है । रहने को एक फूस की कुटिया है । फूस फाड़फाड़कर लोग उसकी स्त्री को झाँककर देखा करते हैं । अब वह स्त्री निकल गयी है ।
"एक आदमी अपनी स्त्री को कहाँ लेकर रखे, कुछ ठीक नहीं कर सकता था । घर में बड़ा शोर गुल मचा था । वह बड़ी चिन्ता मैं है । परन्तु इस बात की चर्चा अनावश्यक है ।
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"और औरतों के साथ रहने से ही उनके वश हो जाना पड़ता है । औरत की बात पर संसारी आदमी उठते-बैठते हैं । सब के सब अपनी अपनी बीबी की तारीफ करते हैं ।
"मैं एक जगह जाना चाहता था । रामलाल की चाची* से पूछने पर उसने मना किया । फिर मेरा जाना न हुआ । थोड़ी देर बाद सोचा - 'यह क्या ! मैने संसार-धर्म नहीं किया – कामिनी-कांचन त्यागी हूँ, इतने पर भी ऐसा ! जो संसारी है, परमात्मा जाने, स्त्रियों के वश में वह कितना है ।'” (*श्रीरामकृष्णदेव की लीलासहधर्मिणी श्रीसारदादेवी ।)
(क्रमशः)

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