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*अनाथों का आसरा, निरधारों आधार ।*
*निर्धन का धन राम है, दादू सिरजनहार ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *॥ महाप्रसाद ॥*
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*॥ महाप्रसाद की अवज्ञा होने पे भक्त दण्ड ग्रहण करते हैं ॥*
होत अवज्ञा प्रसाद की, भक्त गहत है दण्ड ।
पुरी भूप ने हाथ निज, करा दिया था खण्ड ॥१६७॥
दृष्टांत कथा – पुरुषोत्तम पुरी के राजा चौसर खेल रहे थे । पुजारी जगन्नाथजी का प्रसाद लेकर आया । राजा के दाहिने हाथ में पांसा था । इससे प्रसाद लेने को बांया हाथ फैलाया । इससे पुजारी महाप्रसाद की अवज्ञा(अनादर) समझ कर क्रोधित होकर प्रसाद पीछा ही ले जाने लगा । राजा अपने अपराध पर लज्जित होकर पुजारी से नम्रता पूर्वक प्रार्थना करके महाप्रसाद लिया ।
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फिर प्रसाद के अनादर के दण्ड रूप में हाथ कटाने का निश्चय करके अपने मन्त्री से कहा = 'मेरे यहां रात को एक भूत आता है और झरोखे में हाथ डाल कर शोर मचाता है, सो तुम रात को मेरे मकान में रहो, जब वह झरोखे से हाथ डाले तब उसका हाथ काट डालो ।'
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मन्त्री राजा के कथनानुसार तलवार निकाल कर खड़ा हो गया । फिर राजा ने ही अपना दाहिना हाथ डाल कर शोर किया । मन्त्री ने जोर से तलवार मार कर हाथ को काट गिराया । फिर राजा को पहचान कर दुखी हुआ । राजा – 'तुम चिन्ता मत करो जो भगवत् विमुख हो वही भूत-प्रेत है ।
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उधर भगवान् ने भक्त की ऐसी निष्ठा देख कर पुजारिओं को आज्ञा दी – 'राजा के लिये प्रसाद ले जाओ और कटा हुआ हाथ ले आओ ।' राजा भी दर्शन को चल पड़े थे । मार्ग में ही पुजारी लोग मिल गये । राजा ने बड़े भाव से प्रसाद के लिये दोनों हाथ उठाये । उसी समय कटा हुआ हाथ भी नया निकल आया ।
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राजा ने दोनों हाथों से प्रसाद लिया और भगवान् का दर्शन कर के आनन्द मग्न हो गये । कटे हुये हाथ को भगवान् ने अपने बाग में लगवा दिया । उसका परम सुगन्ध युक्त फूलों वाला दौना का वृक्ष बन गया । सुनते हैं कि अब तक भी उसके पुष्प भगवान् के चढ़ाये जाते हैं । इससे ज्ञात होता है कि भगवत् प्रसाद के अनादर होने आर भक्त जन कठोर दण्ड ग्रहण करते हैं ।

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