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*जाके हिरदै जैसी होइगी, सो तैसी ले जाइ ।*
*दादू तू निर्दोष रह, नाम निरंतर गाइ ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *॥ महाप्रसाद ॥*
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*॥ महाप्रसाद के भाव से मदिरा मांस भी प्रसाद ॥*
महाप्रसाद के भाव से, मदिरा मांस प्रसाद ।
हो सुरेश्वरानन्द ने, दिखलाया सु प्रसाद ॥१६८॥
दृष्टांत कथा – श्री स्वामी रामानन्दजी के शिष्य सुरेश्वरानन्दजी महाप्रसाद के बड़े प्रेमी थे । एक बार मार्ग में चलते समय किसी द्वेषी ने मदिरा मांस के बने बड़े आगे लाकर कहा – 'यह भगवत् का महाप्रसाद है ।'
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भगवत् महाप्रसाद का नाम सुनते ही सुरेश्वरानन्दजी ने लेकर पालिये और चल पड़े । पीछे से जो शिष्य आ रहे थे उन्होंने भी गुरु की देखा देख खाया । गुरु ने क्रोधित होकर पुछा – 'तुमने क्या खाया ?' शिष्यगण – 'जो आपने ।' गुरु - ‘मैंने तो महाप्रसाद का भोग लगाया है, यदि तुमने भी महाप्रसाद पाया है तो हम सब उलटी करके देखें ।’
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शिष्यों के पेट मांस मदिरा के बड़े निकले और गुरु के पेट से तुलसी दल तथा गंगाजी की रेणुका के सहित गंगा जल निकला । इससे सूचित होता है कि महाप्रसाद के भाव से मांस मदिरा भी महाप्रसाद बन जाते हैं ।

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