रविवार, 7 नवंबर 2021

*२०. सारग्राही कौ अंग ~ ५३/५७*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२०. सारग्राही कौ अंग ~ ५३/५७*
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दरसन देखै परसपर, कोइ दुनियां कोइ दीन ।
जगजीवन कै एक ही, वो अंग मांहै लीन ॥५३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि एक दूसरे को देखें कोइ संसार में लगा है कोइ दीन है । संत कहते हैं कि वे ही सार्थक हैं जो प्रभु में लगे हैं ।
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कहि जगजीवन सकल के, हरि मंहि बूझै नांम ।
उनमनि अलख अगाध भजि, जे गुन गावै रांम ॥५४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि साधक सिर्फ प्रभु के नाम का ही ध्यान रखते हैं । वे आध्यात्मिक उन अलख अगाध प्रभु के गुण राम राम सिमर कर उनकी महिमा कहते हैं ।
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मुख तैं बुरा न काढ़िये, त्याग बुरी सब बांण१ ।
नांव भला भगवंत का, जगजीवन चित आंण ॥५५॥
{१. बांण=आदत(=प्रकृति, स्वभाव)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि मुख से कुछ भी बुरा मत कहे सब बुरी आदतों का त्याग करें । और सबसे भला प्रभु का नाम है उसका ध्यान करने की आदत बना लें यह ही सर्वश्रेष्ठ है ।
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कहि जगजीवन जाति जल, जल की जाति अनंत ।
प्रेम सरोवर जे रहैं, हंस लहैं ते कंत ॥५६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जल भिन्न भिन्न प्रकार का होता है । इसके अनंत प्रकार है । जल आर्द्रता का प्रतीक है । जो जन प्रेमरुपी मानसरोवर में वे हंस जन ही परमात्मा रुपी प्रियतम को पाते हैं ।
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जाति हमारी संत जन, जिनमैं उत्तम नांम । 
कहि जगजीवन मांहिली, मिलन तहां जहँ रांम ॥५७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हम संत जन हैं जो प्रभु नाम को ही उत्तम मानते हैं । और हमारे अंतर में सदा प्रभु मिलन की चाह रहती है ।
(क्रमशः)

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