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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.१२८)*
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*१२८. गुजराती भाषा । त्रिताल*
*वाहला हौं जाणूं जे रंग भर रमिये,*
*मारो नाथ निमिष नहिं मेलूँ रे ।*
*अंतरजामी नाह न आवे,*
*ते दिन आव्यो छैलो रे ॥टेक॥*
*वाहला सेज हमारी एकलड़ी रे,*
*तहँ तुजने केम न पामों रे ।*
*आ दत्त अमारो पूरबलो रे,*
*तेतो आव्यो सामों रे ॥१॥*
*वाहला मारा हृदया भीतर केम न आवै,*
*मने चरण विलम्ब न दीजे रे ।*
*दादू तो अपराधी तारो,*
*नाथ उधारी लीजे रे ॥२॥*
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भा० दी०-अहं मम स्वामिना सह प्रेमपूर्णया ऽन्तःकरणवृत्त्या सदा क्रीडामि । निमेषमात्रमपि तं न विमोक्तुमिच्छामि । परन्तु स तु अन्तर्यामी सन्नपि न प्रादुर्भवति । मृत्युश्च सन्निहितो जातः । हे प्रियतम प्रभो ! ममेयं हृदयशय्या स्वामिनं विना शून्या वर्तते । किं कारणं तत्र त्वां शयानं न पश्यामि । मन्येऽहं पूर्वजन्मकृतकर्मफलमिदं विरहजन्यं दुःखम् । हे मम प्रियतम प्रभो ! कथय किमर्थं मम हृदये न निवससि । मुखकमलदर्शनदानेऽधुना मा विलम्बस्व । किन्तु द्रुततरं दर्शय । यद्यप्यह तव कृतापराधोऽस्मि तथापि तावकीनोऽस्मि । क्षमस्व मेऽपराधम् । नहि सर्वथा ते तिरोभाव उचितः । यतो हि त्वं स्वपरभावविवेकं वेत्सि । अन्तर्यामित्वेनाऽपि सर्व मनोभावं जानासि । नह्या- काशवच्छून्योऽसि । सर्वज्ञत्वात् सर्वव्यापकत्वाच्च । तस्मात्त्वदर्शनदानाभावे नाहं सद्धेतुं पश्यामि । अतो दर्शनं देहि ।
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मैं अपने स्वामी के साथ प्रेम भरी अन्तःकरण की वृत्ति से सदा खेलता रहूं । एक पल भर भी उस से दूर न रहूं । किन्तु वह तो अन्दर रहता हुआ भी नहीं आता और मेरी मृत्यु भी नजदीक ही आ गयी ।
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हे मेरे प्यारे परमात्मन् ! यह मेरी हृदय-शय्या तेरे बिना सूनी हो रही है । क्या कारण है कि जिससे मैं आपको मेरी हृदय-शय्या पर नहीं देखता ? मैं मानता हूं यह विरहजन्य जो दुःख है, यह मेरे पूर्व जन्मों के किये हुए कर्मों का ही फल है ।
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हे प्यारे परमेश्वर ! आप ही कहिये कि यदि पूर्व जन्म के कर्मों का फल नहीं तो फिर आप मेरे हृदय में क्यों नहीं आते ? अब आप चरण-कमलों के दर्शन देने में जरा भी विलम्ब मत करो, शीघ्र दर्शन दीजिये । यद्यपि मैं आप का महा अपराधी हूं, फिर भी मैं हूं तो आपका ही ।
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अतः हे स्वामिन् ! दर्शन देकर इस विरह व्यथा से मेरा उद्धार कीजिये । अपराध को क्षमा करो । आपका यह इस प्रकार छिपना अच्छा नहीं है क्योंकि आप अपने और पराये का ज्ञान रखते हैं और अन्तर्यामी होने से सब के मनोभावों को भी पहचानते हैं । आप आकाश की तरह जड नहीं हैं, चेतन सर्वज्ञ हैं । इसलिये दर्शन न देने में कोई सद्हेतु नहीं मानता कि जिससे मैं दर्शन का पात्र न माना जाऊं ।
(क्रमशः)

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