🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 卐 *सत्यराम सा* 卐 🙏🌷
🌷🙏 *#श्री०रज्जबवाणी* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*जप तप करणी कर गये, स्वर्ग पहुँचे जाइ ।*
*दादू मन की वासना, नरक पड़े फिर आइ ॥*
==============
श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
*गुप्त पाप का अंग १६७*
इस अंग में गुप्त पाप संबंधी विचार कर रहे हैं ~
.
मन में विषिया बिलसिये, पानी में पेशाब ।
रज्जब जाणें जगत गुरु, जगत न बूझै१ ज्वाब२ ॥१॥
मन में जो विषय भोग किये जाते हैं, वे कोटि पर्यन्त जल में खड़े रहकर पेशाब करने के समान हैं । जैसे उक्त प्रकार जल में पेशाब करने का उत्तर२ कोई नहीं पूछता१ कि - तुने जल में पेशाब क्यों किया ? वैसे ही जगत के प्राणी तो मन में विषय भोग का उत्तर नहीं पूछते किंतु जगत गुरु तो जानते हैं, वे तो अनुचित का दंड अवश्य देंगे ही ।
.
मन चोरी चिन्ता सजा, गात गुनह तन मार ।
रज्जब रचना राम की, नर शिर नीति विचार ॥२॥
मन में चोरी का संकल्प करना ही मन की चोरी है और उसका दंड मन में चिंताहोना है । शरीर से होने वाले पाप का दंड शरीर पर भार पड़ना है । इस राम की रचना रूप संसार में मनुष्य के शिर पर ही नीति का विचार रहता है । अन्य प्राणी तो मनुष्य शरीर में किये हुये कार्य के फल ही भोगता हैं ।
.
गुप्त पाप गुप्त हि सजा, मार होय मन माँहिं ।
रज्जब समझैं समझणा१, सो सठ समझैं नांहिं ॥३॥
गुप्त पाप का दंड गुप्त ही होता है । मन में ही चिंता रूप मार पड़ती है । इस बात को समझने वाले ही समझते हैं, जो मूर्ख हैं वे नहीं समझते ।
.
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित गुप्त पाप का अंग १६७ समाप्तः ॥सा. ५११५॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें