🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
https://www.facebook.com/DADUVANI
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
.
*२१. बिचार कौ अंग ~ ९/१२*
.
देह बिन देह सनेह तहां, ओम अलिफ़ द्वै नांम ।
कहि जगजीवन एक हरि, वोहि रहीम वोहि रांम ॥९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जहाँ निराकार के प्रति प्रेम श्रद्धा हो चाहे वो राम हो या रहीम हो वह ओम व अलिफ़ से बने हैं । परमात्मा के उस स्वरूप को चाहे रहीम या राम किसी भी नाम से पुकारे ।
.
रांम रहीम करीम क्रिषन हरि, करता पुरिष अगाध ।
कहि जगजीवन दलबजा, पाक दिल दिल साध ॥१०॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि राम रहीम कृष्ण हरि ये सब उन कर्ता पुरुष के नाम हैं । संत कहते हैं कि पंथ से परे साधु जन के दिल निर्मल रहते हैं ।
.
कै मन मोहै रांमजी, कै गिरितनया१ गहर२ ।
कहि जगजीवन ऊभै थिति, घड़ी महूरत पहर ॥११॥
{१. गिरितनया=पार्वती(=माया)} (२. गहर=दुर्गम)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे जीव अपने मन को राम जी के मोह में लगायें नहीं तो वह माया में लग जायेगा । दोनों ही स्थिति घड़ी मुहुर्त पहर तक नहीं वरन आजीवन रहती है या राम में या माया में ।
.
कै मन मांहै हरि सक्ति, कै हरि नांम निवास ।
प्रव्रिति३ निव्रिती४ जुगल जागि, सु कहि जगजीवनदास ॥१२॥
(३. प्रविति=सांसारिक विषय भोग) {४. निव्रिती=निवृत्ति(वैराग्य)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि या तो मन में प्रभु की शक्ति है या प्रभु नाम का वास हो । इस संसार में वैराग्य व विषय भोग दोनों ही है ज्ञानी जन ज्ञान से वैराग्य व संसारी संसार के विषयभोगों में ही लिप्त रहते है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें