बुधवार, 17 नवंबर 2021

*राम कला कहि मैं न भुलाऊं*

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🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏
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*दादू समर्थ सब विधि सांइयाँ, ताकी मैं बलि जाऊँ ।*
*अंतर एक जु सो बसै, औरां चित्त न लाऊँ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ समर्थता का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*काम गुपाल जु को कर दर्शन,*
*राम स्वरूप हि शीश नवाऊं ।*
*धारि लिये कर सायक धन्नुष,*
*देखि छबी कहि यूं गुन गाऊं ॥*
*कोउ सुनावत कृष्ण स्वयं हरि,*
*राम कला कहि मैं न भुलाऊं ।*
*जानत हूं दशरत्थ लला अब,*
*ईश्वर आप कहे मन लाऊं ॥१८७॥*
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वृन्दावन में तुलसीदास जी नाभाजी तथा अन्य कुछ वैष्णवों के साथ मुख्य मन्दिरों में दर्शन करते हुये श्री मदनगोपाल जी के मन्दिर में प्राये। वहां तुलसीदासजी दण्ड वत् प्रणाम करना चाहते ही थे कि एक कृष्णोपासक ने परशुराम जी का यह दोहा बोला -
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"अपने अपने इष्ट को, नमन करे सब कोय।
इष्ट विहीना परशुराम नबै सो मुरख होय॥"
परशुराम का वचन सुन, मानत हिये हुलास।
सीता रवन सँभारिके बोले तुलसीदास ॥१॥
कहा कहूं छवि आज की, भले बने हो नाथ ।
तुलसी मस्तक तब नवै, घरो धनुष शर हाथ ॥२॥
मुरली लकुट दुराय के, घर्यो धनुष शर हाथ ।
तुलसी लखि रुचि दास की, नाथ भये रघुनाथ ॥३॥
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श्री मदन गोपालजी तुलसीदासजी के लिये रघुनाथ बन गये यह सबने प्रत्यक्ष देखा । तब सब मिलकर जय ध्वनि करने लगे। एक समय ज्ञान गुदड़ी में तुलसीदासजी विराज रहे थे । किसी व्रजवासी ने कहा-कृष्ण तो स्वयं भगवान् हैं, और सब अंशा वतार हैं। आप कृष्ण को छोड़कर रामजी को क्यों भजते हैं ?
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आप सुनते ही राम-प्रेम में अनुरक्त बुद्धि से युक्त बोले-"मैं तो रामजी को दशरथजी के पुत्र समझकर के ही भजता था किन्तु आज आापने ईश्वर के कला(अंशा) वतार बताकर उनकी ईश्वरता भी बता दी है, इससे में रामजी में और भी अधिक प्रीति से मन लगाऊंगा, भूलूंगा नहीं।
"जो जगदीश तो प्रति भलो, जो भूपति तो भाग।
तुलसी चाहत जन्म भरि, राम चरण अनुराग ॥
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तुलसीदासजी ने बारह ग्रंथों की रचना की है- १. रामलला महळू, २. विराग, संदीपिनी, ३. बर, ४. पार्वती मंगल, ५. जानकी मंगल, ६. रामाज्ञा, ७. दोहावली, ८. कवित्तावलि, ६. गीतवन्ध, १०. कृष्ण गीतावलि, ११. मानस रामा ण, १२. विनय पत्रिका ।
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कुछ सज्जन सोलह ग्रंथ भी बताते हैं किन्तु उनमें व अर्थ आदि शैली आपकी-सी नहीं देखकर लोगों का मत भेद है। आपका जीवन वृत्तान्त अद्भुतता से पूर्ण है। आपने काशी क्षेत्र में वि. संवत् १६८० में श्रावण शुक्ला सप्तमी को अपने नश्वर शरीर को त्याग कर श्री रामधाम को प्रस्थान किया था।
(क्रमशः)

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