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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२१. बिचार कौ अंग ~ १३/१६*
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कहि जगजीवन हम नहीं, है सो साहिब एक ।
जाति वरण कुल नांम धरि, कीन्हां चरित५ अनेक ॥१३॥
{चरित=लीला(चेष्टा)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हमारा कोइ अस्तित्व नहीं है जो अस्तित्व है वो साहिब यानि प्रभु का है । ये तो जाति कुल वर्ण ये नाम धर के अनेक चरित कर दिये हैं । कितने व्यक्तित्व बना दिये हैं ।
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कहि जगजीवन देह के, जाति वरण कुल नांम ।
आतम भीतर एक है, अकल पुरिष सब ठांम ॥१४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि देह के जाति कुल वर्ण के कारण कितने ही नाम धरे जाते हैं किन्तु आत्मतंर तो एक परमात्मा ही है ।
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कहि जगजीवन मन नहीं, तन तुछ६ आगै आहि ।
तेज पुंज मांहै बिलावै, मिट जा चित की चाहि ॥१५॥
{६. तुछ=तुच्छ(=निस्सार)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि मन ही शरीर को अपनी चेष्टाओं से तुच्छ करता है अगर मन देह को प्रभु के साथ जोड़ दे तो चित की सारी चाहत मिट जाये और देह सार्थक हो जाये ।
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कहि जगजीवन रांमजी, हरि सूं हेत लगाइ ।
दीरघ७ नांम उचारि करि, पुलक प्रेम रस पाइ ॥१६॥
{७. दीरघ=दीर्घ(=बहुत काल तक)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे जीव परमात्मा से स्नेह करो बहुत समय तक भजन करने से प्रभु का प्रेम रुपी रस मिलता है ।
(क्रमशः)

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