मंगलवार, 16 नवंबर 2021

*समन्वय के बारे में उपदेश*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*अपने अमलों छूटिये, काहू के नाहीं ।*
*सोई पीड़ पुकार सी, जा दूखै माहीं ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साँच का अंग)*
===============
साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
.
*(४) समन्वय के बारे में उपदेश । दान और ध्यान*
.
श्रीरामकृष्ण - (मणि से) - अच्छा, इतने आदमी जो यहाँ खिचकर चले आते हैं, इसका क्या अर्थ ?
मणि - मुझे तो व्रज की लीला याद आती है । कृष्ण जब चरवाहे और गौएँ बन गये, तब चरवाहों पर गोपियों का और बछड़ों पर गौओं का प्यार बढ़ गया अधिक आकर्षण हो गया ।
श्रीरामकृष्ण - वह ईश्वर का आकर्षण था । बात यह है कि माँ ऐसा ही जादू डाल देती हैं जिससे आकर्षण होता है ।
.
“अच्छा, केशव सेन के यहाँ जितने आदमी जाते थे, यहाँ तो उतने आदमी नहीं आते । और केशव सेन को कितने आदमी जानते-मानते हैं, विलायत तक उसका नाम है, विक्टोरिया ने उससे बातचीत की थी । गीता में तो है कि जिसे बहुत से आदमी जानते-मानते हैं, वहाँ ईश्वर की ही शक्ति रहती है । यहाँ तो उतना नहीं होता ।"
मणि - केशव सेन के पास संसारी आदमी गये थे ।
श्रीरामकृष्ण - हाँ, यह ठीक है, वे ऐहिक कामनाएँ रखने वाले थे ।
.
मणि - केशव सेन जो कुछ कर गये हैं, क्या वह टिक सकेगा ?
श्रीरामकृष्ण - क्यों, वे एक संहिता लिख गये हैं, उसमें उनके ब्राह्मसमाजी अनुवायियों के लिए नियमादि तो लिखे हैं ।
मणि – अवतारी पुरुष जब स्वयं कार्य करते हैं, तब एक और ही बात होती है, जैसे चैतन्यदेव का कार्य ।
श्रीरामकृष्ण - हाँ हाँ, यह ठीक है ।
.
मणि - आप तो कहते हैं - चैतन्यदेव ने कहा था - 'मैं जो बीज डाले जा रहा हूँ, कभी न कभी इसका कार्य अवश्य होगा ।’ छत पर बीज था, जब घर ढह गया, तब उस बीज से पेड़ पैदा हुआ ।
श्रीरामकृष्ण - अच्छा, शिवनाथ आदि ने जो समाज बनाया है, उसमें भी बहुत से आदमी जाते हैं ।
मणि - जी, वैसे ही आदमी जाते हैं ।
श्रीरामकृष्ण - हाँ हाँ, सब संसारी आदमी जाते हैं । जो ईश्वर के लिए व्याकुल कामिनी-कांचन के त्याग करने की चेष्टा कर रहे हैं, ऐसे आदमी बहुत कम जाते हैं, यह ठीक है ।
.
मणि - अगर यहाँ से एक प्रवाह बहे, तो बड़ा अच्छा हो - उस प्रवाह के वेग में सब बह जायँ । यहाँ से जो कुछ होगा, वह अवश्य ही एक विशेष ढर्रें का न होगा ।
श्रीरामकृष्ण - (सहास्य) - जिस मनुष्य का जो भाव है, मैं उसके उस भाव की रक्षा करता हूँ । वैष्णवों से वैष्णव-भाव ही रखने के लिए कहता हूँ, शाक्तों से शाक्त-भाव; परन्तु इतना उनसे और कह देता हूँ कि यह मत कहो कि हमारा ही मार्ग सत्य है और बाकी सब मिथ्या - भ्रम है ।
.
"हिन्दू, मुसलमान, ईसाई ये सब अनेक मार्गों से होकर एक ही जगह जा रहे हैं । अपने भाव की रक्षा करते हुए, उन्हें हृदय से पुकारने पर उनके दर्शन होते हैं ।
"विजय की सास कहती हैं, 'तुम बलराम आदि से कह दो, साकार-पूजन की क्या जरूरत है ? निराकार - सच्चिदानन्द को पुकारने से ही काम सिद्ध हो जायगा ।’
"मैंने कहा, ऐसी बात मैं ही क्यों कहूँ और वे ही क्यों सुनने लगे ? रुचिभेद के अनुसार - अधिकारियों में भेद देखकर एक ही चीज के कितने ही रूप कर दिये जाते हैं ।"
.
मणि - जी हाँ, देश, काल और पात्र के भेद से सब अलग अलग रास्ते हैं । परन्तु चाहे जिस रास्ते से आदमी जाय, मन को शुद्ध करके और हृदय से व्याकुल हो जब उन्हें पुकारता है, तो उन्हें पाता अवश्य है । यही बात आप कहते हैं ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें