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*साधु बरसैं राम रस, अमृत वाणी आइ ।*
*दादू दर्शन देखतां, त्रिविध ताप तन जाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*बनवारीदासजी राम रंगीले*
*राम रंगीलो भक्ति निधि, वनवारी बपु प्रेम को ॥*
*नौख१ चौख२ अति निपुन, बात कविता में चातुर ।*
*खीर नीर विवरन सु, हंस सन्तन सम पातुर३ ॥*
*सब जीवन के सुहृद, सनातन धर्म संतोषी ।*
*शुभ लक्षण गुनवान, भजत भयो जीवन मोखी४ ॥*
*पातक नाशत वर्ग तैं, जुतो करत नित नियम को ।*
*राम रंगीलो भक्ति निधि, बनवारी बपु प्रेम को ॥१६६॥*
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रामरंगीले बनवारीदास जी भक्ति की निधि और प्रभु-प्रेम के तो मानो शरीर ही थे।
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प्रणय उलाहने१ रूप चतुराई२ में अति निपुण थे। बात करने तथा कविता करने में बड़े चतुर थे। जैसे हंस जल और दूध को अलग-अलग करने में समर्थ होता है वैसे ही वे सत्य असत्य को विवरण पूर्वक अलग-अलग करके बताने में समर्थ और संतों के समान राम कृपा के पात्र३ थे।
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सबही जीवों के सुहृद थे। सनातन धर्म का पालन करने वाले थे। संतोषी थे, शुभ लक्षणों से युक्त थे। क्षमा दया यादि गुणों से तथा सतोगुण से युक्त थे। भगवत् भजन करके जीवन्मुक्त४ हो गये थे।
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उनके दर्शन से प्राणियों के पाप नष्ट होते थे। जितना भी भजन ध्यानादि करते थे सो नित्य नियम पूर्वक करते थे ।
(क्रमशः)

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