शनिवार, 20 नवंबर 2021

*भक्तों के साथ कीर्तनानन्द में*

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*ज्यों तुम भावै त्यों खुसी, हम राजी उस बात ।*
*दादू के दिल सिदक सौं, भावै दिन को रात ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ विश्वास का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(५)भक्तों के साथ कीर्तनानन्द में*
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श्रीरामकृष्ण कमरे में अपने आसन पर बैठे हुए हैं । दिन के तीन बजे का समय होगा । नीलकण्ठ पाँच-सात साथियों के साथ श्रीरामकृष्ण के कमरे में आये । श्रीरामकृष्ण उनकी अभ्यर्थना के लिए उठकर कुछ बढ़े । नीलकण्ठ कमरे के पूर्व द्वार से आये और श्रीरामकृष्ण को भूमिष्ठ हो प्रणाम किया ।
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श्रीरामकृष्ण समाधिलीन हो गये हैं, उनके पीछे बाबूराम है, सामने नीलकण्ठ, मास्टर और आश्चर्य में डूबे हुए नीलकण्ठ के साथी । खाट के उत्तर की ओर दीनानाथ खजानची आकर दर्शन कर रहे हैं । देखते ही देखते कमरा श्री ठाकूर-मन्दिर के आदमियों से भर गया । कुछ देर बाद श्रीरामकृष्ण के भाव में कुछ उपशम हुआ । श्रीरामकृष्ण जमीन पर चटाई पर बैठे हुए हैं । सामने नीलकण्ठ हैं और चारों ओर भक्त-मण्डली ।
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श्रीरामकृष्ण – (आवेश में) - मैं अच्छा हूँ ।
नीलकण्ठ - (हाथ जोड़कर) - मुझे भी अच्छा कर लीजिये !
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) - तुम अच्छे तो हो । 'क' में आकार लगाने से 'का' होता है, उस पर फिर आकार लगाने से क्या फल होगा ? 'का' पर एक और आकार लगाने से 'का' का 'का' ही रहता है ! (सब हँसते हैं ।)
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नीलकण्ठ - इस संसार में पड़ा हुआ हूँ ।
श्रीरामकृष्ण - (सहास्य) - तुम्हें संसार में उन्होंने और पाँच आदमियों के लिए रखा है ।
"अष्ट पाश हैं । ये सब नहीं जाते । दो-एक पाश वे रख देते हैं लोकशिक्षा के लिए । तुमने यह नाटक किया है, तुम्हारी भक्ति देखकर कितने ही आदमियों का उपकार होता है । और तुम अगर सब छोड़ दोगे, तो ये लोग (साथ के नाटकवाले) फिर कहाँ जायेंगे ?
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"वे तुम्हारे द्वारा काम कराये लेते हैं, काम पूरा हो जाने पर फिर तुम्हें लौटना न होगा । गृहिणी जब घर का कुल काम कर लेती है, सब को खिला-पिला लेती है - दास दासियों को भी - तब खुद नहाने के लिए जाती है, उस समय बुलाने पर भी वह नहीं लौटती ।"
नीलकण्ठ - मुझे आशीर्वाद दीजिये ।
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श्रीरामकृष्ण - कृष्ण के वियोग से यशोदा की उन्मादावस्था थी । वे राधिका के पास गयी थीं । उस समय राधिका ध्यान कर रही थीं । उन्होंने भावावेश में यशोदा से कहा - "मैं वही मूल प्रकृति हूँ - आद्याशक्ति हूँ, तुम मुझसे वर की प्रार्थना करो ।’
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यशोदा ने कहा, 'और क्या वर दोगी, यही कहो, जिससे मन, वाणी और कर्मों से भगवान की सेवा कर सकूँ, कानों से उनका नाम, उनके गुण सुनूं, हाथों से उनकी और उनके भक्तों की सेवा कर सकूँ; आँखों से उनके रूप और उनके भक्तों के दर्शन कर सकूँ ।'
“उनका नाम लेते हुए जब तुम्हारी आँखों में आँसुओं की धारा बह चलती है, तो तुम्हें चिन्ता किस बात की है ? - उन पर तुम्हारा प्यार हो गया है ।
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"अनेक के जानने का नाम है अज्ञान और एक के जानने का नाम है ज्ञान - अर्थात् एक ही ईश्वर सत्य हैं और सर्व भूतों में विराजमान हैं । उनके साथ बातचीत करने का नाम है विज्ञान - उन्हें प्राप्त कर अनेक प्रकार से प्यार करने का नाम है विज्ञान ।
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"और यह भी है कि वे एक-दो के पार हैं, मन और वाणी से अतीत हैं । लीला से नित्य में जाना और नित्य से लीला में आना - इसका नाम है पक्की भक्ति ।
"तुम्हारा वह गाना बड़ा सुन्दर है - 'श्यामापदे आस, नदी तीरे वास ।’
"इसी से बन जायेगी - सब उनकी कृपा पर निर्भर है ।
"परन्तु उन्हें पुकारना चाहिए । चुपचाप बैठे रहने से न होगा । वकील न्यायाधीश से सब कुछ कहकर अन्त में कहता है - 'मुझे जो कुछ कहना था, मैंने कह दिया, सब आपकी इच्छा ।"
(क्रमशः)

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