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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२१. बिचार कौ अंग ~ २१/२४*
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अलख उपाए जीव सब, अलख उपाई देह ।
कहि जगजीवन रांमजी, अरभख१ मांहि सनेह ॥२१॥
{१. अरभख=अर्भक(बालक, मूर्ख)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि उन परमात्मा ने ही सब जीव पैदा किये हैं । उन्होंने ही यह शरीर दिया है बालक जानकर प्रभु ने इतना सब कुछ दिया है ।
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तेज पुंज परकास हरि, आतम अस्थल२ बास ।
रांम अखंडित एक रस, सु कहि जगजीवनदास ॥२२॥
(२. आतम अस्थल=आत्मा का स्थान)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि परमात्मा तेज के समूह है और आत्मा में बसेरा है । वे निरंतर एक सा आनंद प्रदान करते हैं ।
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नौ सै नवासी नदी, सात समन्द सब थांन ।
कहि जगजीवनदास कौं, रांम रमत आसांन ॥२३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि नौ मुख्य नदियों से नवासी नदियां उनकी पुत्रियों जैसी प्रवाहित हैं, सात समुद्र हैं इन सब स्थानों पर राम नाम सुखकर है ।
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सवा लाख परवत परै, कौन पुहुमि को देस ।
कहि जगजीवन सकल हरि, निज घर रांम नरेस ॥२४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सवा लाख पर्वत इस पृथ्वी पर हैं । तो फिर पृथ्वी किस की है । या कौन से देश की है सर्वत्र परमात्मा ही है । और स्वयं ही प्रभु इस विश्व घर के राजा हैं ।
(क्रमशः)

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