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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२१. बिचार कौ अंग ~ ३३/३६*
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तुछ* खांणा सच बोलणा, दीन गरीबी मांहि ।
कहि जगजीवन रांम जी, ते हरि भूलै नांहि* ॥३३॥
*=*. अल्पभोजी, सत्यवक्ता, विनयी एवं धर्माचारी साधक भगवान् को किसी भी क्षण नहीं भूलता ॥३३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो सादा भोजन करते हैं, व सत्य बोलते हैं, व सामान्य रहन सहन वाले हैं ऐसे विनयी व धर्माचारी कभी भगवान को भूलते नहीं हैं, हर क्षण याद रखते हैं ।
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थिर मन थिर तन थिर सबद, थिर रांम रिदै हरि नांम ।
कहि जगजीवन हरि भगत, सांच कहै सब ठांम ॥३४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जिनका मन स्थिर है, देह स्थिर है, शब्द सयंत व स्थिर है, जिनके हृदय में राम नाम है वे हरि भक्त सर्वत्र सत्य सम्भाषण ही करते हैं ।
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कहि* जगजीवन रांमजी, वे सदा दूज के चांद* ।
रांम भगति समझै नहीं, सौ कहां पावै स्वाद ॥३५॥
(*=*. ऐसा साधक सदा सर्वत्र उसी प्रकार नहीं दिखायी देता जैसे द्वितीया का चन्द्रमा सर्वत्र सदा दिखायी नहीं दिया करता ॥३५॥)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो साधक साधना रत हैं वे संसार के लिये तो दूज के चन्द्रमा की तरह ही हैं जो नित्य दिखाई नहीं देता है और जो जन भक्ति को समझते ही नहीं वे इसके आनंद को कैसे समझ सकते हैं ।
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कौदौं* काया मांहि हरि, रांम नांम निज सार ।
कहि जगजीवन लहौं उरों, ले करि उतरौं पार* ॥३६॥
(*=*. शास्त्रों में आत्मा का आकार कोदों के एक छोटे बीज के बराबर बताया गया है । मैं अपने ह्रदय में उसी आत्मा को अनवरत स्मरण करते हुए इस भवसागर से पार हो जाऊँगा ॥३६॥)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि शास्त्रों में आत्मा के आकार को अति सू्क्ष्म कोदों के बीज सदृश बताया गया है । मैं अपने अंदर उसी सूक्ष्म आत्मा का अनवरत स्मरण कर उसे ही भव सागर से पार होने का साधन बना मोक्ष प्राप्त करुंगा ।
(क्रमशः)

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