🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
https://www.facebook.com/DADUVANI
भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.१३४)*
===============
*१३४. काल चेतावनी । पंचम ताल*
*बटाऊ ! चलना आज कि काल ।*
*समझि न देखे कहा सुख सोवे, रे मन राम संभाल ॥टेक॥*
*जैसे तरुवर वृक्ष बसेरा, पंखी बैठे आइ ।*
*ऐसैं यहु सब हाट पसारा, आप आपको जाइ ॥१॥*
*कोइ नहिं तेरा सजन संगाती, जनि खोवे मन मूल ।*
*यहु संसार देखि जनि भूलै, सब ही सैंबल फूल ॥२॥*
*तन नहिं तेरा धन नहिं तेरा, कहा रह्यो इहि लाग ।*
*दादू हरि बिन क्यों सुख सोवे, काहे न देखे जाग ॥३॥*
.
भा० दी०-हे पथिक ! त्वयाऽद्य श्वो वाऽवश्यं गन्तव्यमिति त्वं विचार्य पश्य, किमर्थं सुखं स्वपिषि! कथं न श्रीरामं स्मरसि ! यथा वृक्षे पक्षिण आरुहा रात्रौ विश्रम्य प्रात उड्डीयन्ते । यथा वा वणिजो वाणिज्यं विधाय दिवसावसाने आपणं विहाय स्वगृहं गच्छन्ति, तथैव संसारिणोऽपि स्वस्वकर्मानुसारं फलं भुक्त्वा शरीरान्तरं गृह्णन्ति । न हात्र कोऽपि चिरस्थायी, नहि कोऽपि तव सज्जनः सहायकः । किमर्थं व्यर्थं प्रभुं विस्मरसि । सर्वं हि जगत् किंशुकपुष्पसदृशं निर्गन्धं नि:स्नेह केवलमाभासमात्रं प्रतीयते । येषु त्वमनुरक्तोऽसि स्त्रीपुत्रादिषु, तेऽपि न ते सहायका: सन्ति । प्रभुदर्शन विना किमर्थं सुखं स्वपिषि! अविद्यां निरस्य प्रभुं किमर्थं न भजसि !
उक्तं योगवासिष्ठे-
विद्राविते शत्रुजने समस्ते समागतायामभितश्च लक्ष्याम् ।
सेवन्त एतानि सुखानि यावत्तावत्समायाति कुतोऽपि मृत्युः ॥
कुतोऽपि संवर्धिततुच्छरु -पैर्भावैरमीभिः क्षणनष्टदृष्टैः ।
विलोड्यमाना जनता जगत्यां न वेत्युपायातमहोऽनुपातम् ॥
.
हे पथिक जीव ! तुझे आज कल यहां से अवश्य जाना है, ऐसा विचार कर, व्यर्थ में ही क्यों सुख से सो रहा है । भगवान् को क्यों नहीं भजता ? जैसे पक्षी रात में वृक्ष पर बैठ जाते हैं और रात में विश्राम करके प्रातः काल उड़ जाते हैं, जैसे व्यापारी दिन में व्यापार करके अपनी दुकान को छोड़ कर सायंकाल अपने घर पर आ जाते हैं, ऐसे ही संसारी मनुष्य अपने-अपने कर्म-फलों को भोग कर दूसरे शरीर में जाते रहते हैं ।
.
इस संसार में कोई भी चिरस्थायी नहीं है । न कोई किसी का सज्जन-साथी है । तू हरि भजन के बिना अपना समय व्यर्थ में ही क्यों खो रहा है ? मिथ्याभूत संसार को देख कर क्यों प्रभु को भूल रहा है ? यह सारा संसार सेमल के फूल की तरह दिखावा मात्र है । जिन स्त्री, पुत्रादिकों में जो तू अनुरक्त हो रहा है, वे भी तेरे नहीं है । अविद्या को हटा कर प्रभु का भजन क्यों नहीं करता ।
.
योगवासिष्ठ में –
समस्त शत्रुओं को मार का र्भ्गा देने पर भी जब चारों ओर से धन संपत्ति प्राप्त होने लगती है, उस समय ज्यों ही मनुष्य इन को भोगने लगता है, त्यों ही मृत्यु कहीं से सहसा आ जाती है । जो किसी कारण से वृद्धि को प्राप्त होकर भी क्षण भर में ही नष्ट होते देखे जाते हैं । ऐसे अत्यन्त तुच्छ भोगों द्वारा इधर-उधर भटकाई गई जनता इस भूतल पर अपने निकट आई हुई मृत्यु को भी नहीं देख पाती । यह कितने आश्चर्य की बात है ?
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें