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*छाजन भोजन परमार्थी, आतम देव आधार ।*
*साधु सेवक राम के, दादू पर उपकार ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*केवल कूबाजी की पद्य टीका*
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*इन्दव – केवल नाम हि संतन सेवत,*
*वंश उधार करयो् जग जाने ।*
*साधु पधारत हेत करयो् बहु,*
*नाज नहीं घर में कछु पाने१ ॥*
*लेन उधार गये जन वैश्य हि,*
*कूप खुदाय तू ले मन माने ।*
*कोल करयो् अब टोल सिताब२ हि,*
*रोल३ चढावत यूं घर आने ॥१८८॥*
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केवल नामक भक्त ने संतों की सेवा करके अपने कुल का उद्धार किया था । यह सब जगत जानता है ।
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एक दिन संतों की मंडली कृपा करके केवल के पधारी थी । केवल ने उनसे बहुत प्रेम किया । किन्तु संतों के खाने१ के लिया केवलजी के पास घर में अन्न नहीं था ।
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भक्त केवलजी एक वैश्य से उधार अन्न लाने गये । तब वैश्य ने कहा – आप हमारा कूप खुदवा दें तब तो मन चाहा अन्न ले सकते हो ।
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केवलजी ने कूप खोदने का प्रण कर लिया और बोले – अब आप शीघ्र२ ही तोल दें । केवलजी ने हाथों से रलका३ का तुला पर चढ़ाया और उक्त प्रकार से अन्न लेकर केवलजी घर पर आये ।
(क्रमशः)

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