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*कर्मों के वश जीव है, कर्म रहित सो ब्रह्म ।*
*जहँ आत्म तहँ परमात्मा, दादू भागा भ्रम ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पारिख का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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कमरे में श्रीरामकृष्ण अपने आसन पर बैठे हुए हैं । जमीन पर मुखर्जियों के सम्बन्धी हरि तथा मास्टर आदि बैठे हैं । एक अनजान आदमी श्रीरामकृष्ण को प्रणाम करके बैठा । श्रीरामकृष्ण ने बाद में कहा था, उसकी आँखों के लक्षण अच्छे नहीं थे - बिल्ली जैसी कंजी आँखें थीं ।
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श्रीरामकृष्ण - (हरि से) - देखूं तो जरा तेरा हाथ । सब कुछ तो है - बड़े अच्छे लक्षण हैं ।
"मुट्ठी खोल जरा । (अपने हाथ में हरि का हाथ लेकर जैसे तौल रहे हों) लड़कपन अब भी है । दोष अभी तक तो कुछ नहीं किया । (भक्तों से) हाथ देखकर मैं कह सकता हूँ कि अमुक खल है या सरल(हरि से) क्या हुआ, तू ससुराल जाया कर - अपनी स्त्री से बातचीत किया कर - और इच्छा हो तो जरा आमोद-प्रमोद भी कर लिया कर ।
(मास्टर से) “क्यों जी ?” (मास्टर आदि हँसते हैं ।)
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मास्टर – जी, नयी हण्डी अगर खराब हो जाय, तो उसमें दूध फिर नहीं रखा जा सकता ।
श्रीरामकृष्ण - (सहास्य)- अभी खराब नहीं हुई, यह तुमने कैसे जाना ?
मुखर्जी दो भाई हैं, महेन्द्र और प्रियनाथ । ये नौकरी नहीं करते । उनकी आटे की चक्की है । प्रियनाथ पहले इंजीनियर का काम करते थे । श्रीरामकृष्ण हरि से मुखर्जी भाइयों की बात कह रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण – (हरि से) - बड़ा भाई अच्छा है न ? - बड़ा सरल है ।
हरि - जी हाँ ।
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श्रीरामकृष्ण - (भक्तों से) - सुनता हूँ, छोटा बड़ा कंजूस है, पर यहाँ आकर कुछ अच्छा हुआ है । उसने मुझसे कहा, 'मैं पहले कुछ नहीं जानता था ।' (हरि से) क्या ये लोग कुछ दान आदि करते हैं ?
हरि - ऐसा कुछ दीख तो नहीं पड़ता, इनके जो बड़े भाई थे, उनका देहान्त हो गया है । वे बड़े अच्छे थे, दान, ध्यान खूब करते थे ।
श्रीरामकृष्ण - (मास्टर आदि से) - किसी के शरीर के लक्षणों को देखकर कहा जा सकता है कि उसकी बन जायेगी या नहीं । खल होने पर हाथ वजनदार होता है ।
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“नाक बैठी हुई होना अच्छा नहीं । शम्भू की नाक बैठी थी । इसीलिए इतने ज्ञान के होने पर भी वह सरल न था ।
"कबूतर जैसा वक्षःस्थल, टेढ़ी-मेढ़ी हड्डियाँ, मोटी कुहनी तथा बिल्ली के समान कंजी आँखें खराब लक्षण हैं ।
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"ओठ अगर डोमों के जैसे होते हैं, तो उसकी बुद्धि नीच होती है । विष्णुमन्दिर का पुजारी कुछ महीने के लिए बदले में काम करने आया था । उसके हाथ का मैं खाता नहीं था । एकाएक मेरे मुँह से निकल गया, वह डोम है । इसके बाद उसने एक दिन कहा - हाँ, मेरा घर डोम-टोले में है, मैं डोमों की तरह सूप इत्यादि बना लेता हूँ ।
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"और भी बुरे लक्षण हैं - एक आँख का काना होना, तिस पर वह भी कंजी आँख । काना फिर भी अच्छा है, परन्तु कंजा बड़ा खतरनाक होता है ।
"महेश्वर का एक छात्र आया था । वह कहता था, मैं नास्तिक हूँ । उसने हृदय से कहा, 'मैं नास्तिक हूँ, तुम आस्तिक होकर मेरे साथ चर्चा करो ।' तब मैंने उसे अच्छी तरह, देखा । देखा - उसकी आँख बिल्ली जैसी थी ।
“चाल देखकर भी अच्छे और बुरे लक्षण समझे जाते हैं ।
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श्रीरामकृष्ण कमरे से बरामदे में आकर टहलने लगे । साथ मास्टर और बाबूराम हैं ।
श्रीरामकृष्ण - (हाजरा से) - एक आदमी आया था । मैंने देखा - उसकी आँखें बिल्ली जैसी थीं । उसने मुझसे पूछा - 'क्या आप ज्योतिष भी जानते हैं ? - मुझे कुछ कष्ट मिल रहा है ।’ मैंने कहा - नहीं, तुम वराहनगर जाओ, वहाँ इसके पण्डित हैं ।
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बाबूराम और मास्टर नीलकण्ठ के नाटक की बात कह रहे हैं । बाबूराम नवीन सेन के घर से दक्षिणेश्वर लौटकर कल रात को यहीं थे । सुबह श्रीरामकृष्ण के साथ दक्षिणेश्वर में नवीन नियोगी के यहाँ नीलकण्ठ का नाटक उन्होंने देखा था ।
श्रीरामकृष्ण - (मास्टर और बाबूराम से) - तुम लोगों की क्या बातचीत हो रही है ?
मास्टर और बाबूराम - जी, नीलकण्ठ के नाटक की बातचीत हो रही है - और उसी गाने की बात - 'श्यामापदे आस, नदीतीरे वास ।'
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श्रीरामकृष्ण बरामदे में हैं । टहलते हुए एकाएक मणि को एकान्त में ले जाकर कहने लगे - 'ईश्वर की चिन्ता में जितना दूसरे आदमियों को भाव मालूम न हो उतना ही अच्छा है ।’ एकाएक यह कहकर श्रीरामकृष्ण चले गये ।
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श्रीरामकृष्ण हाजरा से बातचीत कर रहे हैं ।
हाजरा - नीलकण्ठ ने तो आप से कहा है कि वह आयेगा ।
श्रीरामकृष्ण - नहीं, रात में जागता रहा है - ईश्वर की इच्छा से आप आये, दूसरी बात है ।
श्रीरामकृष्ण बाबूराम से नारायण के यहाँ जाकर मिलने के लिए कह रहे हैं । आप नारायण को साक्षात् नारायण देखते हैं । इसीलिए उसे देखने को व्याकुल हो रहे हैं । बाबूराम से कह रहे हैं - 'तू बल्कि एक अंग्रेजी पुस्तक लेकर उसके पास जाना ।’
(क्रमशः)

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