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*राम रसिक वांछै नहीं, परम पदारथ चार ।*
*अठसिधि नव निधि का करै, राता सिरजनहार ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ निष्काम पतिव्रता का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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कुछ देर बाद श्रीरामकृष्ण ने कहा –
"तुमने सुबह इतना गाया, फिर तकलीफ करके यहाँ आये - परन्तु यहाँ सब 'ऑनरेरी' (Honorary) है ।"
नीलकण्ठ - क्यों ?
श्रीरामकृष्ण - (सहास्य) - मैं समझा, तुम जो कुछ कहोगे ।
नीलकण्ठ - अनमोल रत्न ले जाऊँगा ।
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श्रीरामकृष्ण - वह अनमोल रत्न तुम्हारे ही पास है । 'का' में फिर से आकार लगाने से क्या लाभ ? तुम्हारे पास रत्न न होता तो तुम्हारा गाना इतना अच्छा कैसे लगता ? रामप्रसाद सिद्ध है, इसीलिए उसका गाना अच्छा लगता है ।
"तुम्हारे गाने की बात सुनकर मैं स्वयं जा रहा था, परन्तु नियोगी फिर आया था कहने के लिए ।
श्रीरामकृष्ण छोटे तख्त पर अपने आसन पर जा बैठे । नीलकण्ठ से कहते हैं, जरा माता का नाम सुनने की इच्छा है ।
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नीलकण्ठ अपने साथियों के साथ गाने लगे । कई गाने गाये । एक गाने में एक जगह था - 'जिसकी जटा में गंगाजी शोभा पा रही हैं, उसने हृदय में राजराजेश्री को धारण कर रखा है ।'
श्रीरामकृष्ण की प्रेमोन्मत्त अवस्था हो गयी । वे नृत्य करने लगे । नीलकण्ठ और भक्तगण उन्हें घेरकर गा रहे हैं और नृत्य कर रहे हैं ।
गाना समाप्त हो गया । श्रीरामकृष्ण नीलकण्ठ से कह रहे हैं - मैं तुम्हारा वह गाना सुनूँगा, कलकत्ते में जो सुना था ।
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मास्टर - वह है - 'श्रीगौरांग सुन्दर नव नटवर तपत-कांचन काय ।' उसी के एक पद का अर्धांश गाते हुए श्रीरामकृष्ण फिर नाचने लगे । वह अपूर्व नृत्य जिन लोगों ने देखा है, वे कभी भूल न सकेंगे । कमरे में आदमी ठसाठस भर गये । सब लोग उन्मत्त हो रहे हैं । कमरा मानो श्रीवास का आँगन हो रहा है ।
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श्रीयुत मनोमोहन को भावावेश हो गया । उनके घर को कुछ स्त्रियाँ भी आयी हैं । वे उत्तर के बरामदे से यह अपूर्व नृत्य और संकीर्तन देख रही हैं । उनमें भी एक स्त्री को भावावेश हो गया था । मनोमोहन श्रीरामकृष्ण के भक्त हैं और राखाल के सम्बन्धी ।
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श्रीरामकृष्ण फिर गाने लगे । उच्च संकीर्तन सुनकर चारों ओर के आदमी आकर जम गये । दक्षिण और उत्तर-पश्चिमवाले बरामदे में ठसाठस आदमी भर गये । जो लोग नाव पर जा रहे थे, उन्हें भी इस मधुर संकीर्तन के स्वर से आकर्षित होकर आना ही पड़ा ।
कीर्तन समाप्त हो गया । श्रीरामकृष्ण जगन्माता को प्रणाम कर रहे हैं । कह रहे हैं – “भागवत, भक्त, भगवान् – ज्ञानियों को नमस्कार, योगियों को नमस्कार, भक्तों को नमस्कार ।"
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अब श्रीरामकृष्ण नीलकण्ठादि भक्तों के साथ पश्चिमवाले गोल बरामदे में आकर बैठे । शाम हो गयी है । आज रास-पूर्णिमा का दूसरा दिन है । चारों ओर चाँदनी फैली हुई है । श्रीरामकृष्ण नीलकण्ठ से आनन्दपूर्वक वार्तालाप कर रहे हैं ।
नीलकण्ठ - आप साक्षात् गौरांग हैं ।
श्रीरामकृष्ण - यह सब क्या है ! - मैं सब के दासों का दास हूँ ।
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“गंगा की ही तरंगें हैं, तरंगों की भी कभी गंगा होती है ?"
नीलकण्ठ - आप कुछ भी कहें, हम लोग तो आपको ऐसा ही समझते हैं ।
श्रीरामकृष्ण - (कुछ भावावेश में करुणापूर्ण स्वर से) - भाई, अपने 'मैं' की तलाश करता हूँ, परन्तु कहीं खोजने पर भी नहीं मिलता ।
"हनुमान ने कहा था - हे राम, कभी तो सोचता हूँ, तुम पूर्ण हो, मैं अंश हूँ - तुम प्रभु हो, मैं दास हूँ, और जब तत्त्वज्ञान होता है, तब देखता हूँ, तुम्हीं 'मैं' हो और मैं ही 'तुम' हूँ ।"
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नीलकण्ठ - और क्या कहूँ, हम लोगों पर कृपा रखियेगा ।
श्रीरामकृष्ण - (सहास्य) - तुम कितने ही आदमियों को पार कर रहे हो – तुम्हारा गाना सुनकर कितने ही आदमियों में उद्दीपना होती है ।
नीलकण्ठ - मैं पार कर रहा हूँ, आप कहते हैं; देखिये, खुद न डूबूँ ।
श्रीरामकृष्ण - (सहास्य) - अगर डूबोगे तो उसी सुधा-हृद में ।
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नीलकण्ठ से मिलकर श्रीरामकृष्ण को आनन्द हुआ है । उनसे फिर कह रहे हैं - "तुम्हारा यहाँ आना ! - जो बड़ी साध्यसाधना के बाद कहीं मिलता हैं ।” यह कहकर श्रीरामकृष्ण एक गाना गाने लगे । अन्तिम पद में एक जगह है - “चण्डी को ले आऊँगा ।”
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श्रीरामकृष्ण - चण्डी जब आ गयी हैं, तब कितने ही जटाधारी और योगी आयेंगे ।
श्रीरामकृष्ण हँस रहे हैं । कुछ देर के बाद बाबूराम और मास्टर आदि से कह रहे हैं - "मुझे बड़ी हँसी आ रही है । सोचता हूँ - इन्हें (नाटकवालों को) भी मैं गाना सुना रहा हूँ ।"
नीलकण्ठ - हम लोग जो चारों ओर गाते फिरते हैं, उसका पुरस्कार आज मिला ।
श्रीरामकृष्ण - (सहास्य) - कोई चीज बेचने पर दूकानदार एक मुट्ठी और ऊपर से डाल देता है । वैसे ही तुम लोगों ने वहाँ गाया और एक मुट्ठी यहाँ भी डाल दी ।
(क्रमशः)

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